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News / Articles



बुतों के आगे नतमस्तक जिंदा कौमें

उत्तर प्रदेश में मायावती के बुतों और स्मारकों का मसला एक बार फिर सुर्खियों में है। सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य न्यायाधीश केजी बालकृष्णन के कारण मायावती को मिली कई न्यायिक सुविधाओं-संरक्षण की 'समृद्ध' पृष्ठभूमि के बरक्स बुतों-स्मारकों के प्रसंग में सख्त रवैया अख्तियार कर न्यायिक-उम्मीदों में फिर से थोड़ी सी जान फूंकी है... लखनऊ में जिस दिन मायावती ने अपनी ही मूर्ति का अनावरण किया था और बाबा अंबेडकर के बारे में विवादास्पद बयान दिया था, यह लेख 'बुतों के आगे नतमस्तक कौमें' लिखा गया था। दूसरे सभी अखबारों और टीवी वालों ने इस पर मौन साध कर नतमस्तक कौमों की फेहरिस्त में शामिल होने की जैसे मौन स्वीकृति दे दी थी... वही लेख एक बार फिर हम वेबसाइट के जरिए आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं...

लोक कथाओं में एक सियासी-दिमाग कंजूस का जिक्र आता है जिसने अपने कृत्य से नस्लों को सीख दी थी कि मुफ्त की लकड़ी मिले तो जीते जी अपनी चिता आप सजा लो। हास्य में कही जाने वाली ऐसी लोक कथाएं आज यथार्थ में घटने लगीं और हमारे आपके दुखद संस्मरण का हिस्सा बनने लगी हैं। सत्ता की ताकत के बूते सत्ताधारिणी जीते जी अपनी ही मूर्ति खुद स्थापित कर उसका अनावरण कर ले, ऐसी घटना आधुनिक राजनीतिक इतिहास की पहली घटना है।
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खबरें @ डेली न्यूज़ ऐक्टिविस्ट |

कभी नहीं मरूंगा मैं

एक ऐसा शख्स जिसने न केवल इतिहास बदला बल्कि भूगोल भी बदल डाला। एक ऐसा व्यक्तित्व जिसने दुनिया के फलक पर भारत की प्रतिष्ठा को प्रतिष्ठित किया। एक ऐसा महायोद्धा जिसने युद्ध के खौफ की परिभाषा बदल डाली। एक ऐसा सेनापति जिसने दुश्मन सेना के सेनापति और उसके एक लाख सैनिकों को घुटने टेकने की विवशता का इतिहास लिख डाला। ऐसे शाश्वत योद्धा की अंतिम दैहिक यात्रा में सत्ता का भोग लगाने वाले सियासतदानों को शरीक होने की फुर्सत नहीं मिली...
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खबरें @ डेली न्यूज़ ऐक्टिविस्ट |

अब सरमायेदार तय करेंगे केंद्र की सत्ता

सियासतदानों के साथ सरमायेदारों की खिचड़ी पक रही है। नेता और उद्योगपति मिल कर 15वीं लोकसभा के लिए होने वाले चुनाव के बाद केंद्र की सत्ता पर कौन बैठे और किससे उनके हित सधें इसे लेकर ताना-बाना बुनने का काम तेजी से कर रहे हैं। सियासत की यह कैसी लीला है कि टाटा घराने के रतन टाटा और अंबानी घराने के मुकेश अंबानी मिल कर तीसरे मोर्चे और वाम मोर्चे को मिला कर सत्ता विकल्प खड़ा करने के उद्योग में लगे हुए हैं। भारतीय लोकतंत्र का यह दुश्चरित्र-तथ्य है। देश में पहले भी मतदान से लेकर सत्ता निर्माण तक धन-सूत्र थामे रहने का खेल पूंजीपति खेलते आए हैं, लेकिन यह पहली बार होगा कि दो-तीन उद्योगपति मिल बैठकर प्रधानमंत्री तय कर लें और गद्दी पर अपना मुहरा बिठा कर सत्ता पर अपनी सीधी पकड़ रखें...
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खबरें @ डेली न्यूज़ ऐक्टिविस्ट |

मेहमान खिलाड़ियों पर हमले का धर्म...

श्रीलंकाई खिलाड़ियों पर गोलियां दागने वाले जांबाज जेहादियों के खिलाफ जब शाम तक दुनिया के किसी भी हिस्से से किसी भी इस्लामी धर्मगुरू का कोई फतवा नहीं आया तो हमारे सहकर्मी पत्रकार साथी का वह सवाल मस्तिष्क में फिर बम की तरह फटा कि कौन कहता है कि धर्म किसी व्यक्ति या किसी समुदाय के चरित्र और उसके आचरण पर असर नहीं डालता? साथी के इस सवाल का संशोधन करते हुए भी जवाब पाने के बजाय प्रतिप्रश्न ही कौंधता है कि इस्लाम को मानने वाले लोग इस्लाम के नाम पर ही हो रहे बुद्धिहीन कृत्यों के खिलाफ उठ खड़े क्यों नहीं हो रहे? या तो उन्हें धर्म का अफीम खिला खिला कायर बना दिया गया है, या इस्लाम के नाम पर हो रही अधार्मिक हिंसा को वे मौन सहमति देकर उसमें शामिल हैं। ये दो ही तो बातें हो सकती हैं? या कोई तीसरा तर्क-मार्ग भी है? या बचाव का कोई अन्य रास्ता?...
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खबरें @ डेली न्यूज़ ऐक्टिविस्ट |

दुर्भाग्यपूर्ण...

बांग्लादेश में सैन्य विद्रोह कोई मामूली घटना नहीं है। उत्तर भारत से छपने वाले अखबारों और टीवी पर दिखने वाले समाचार चैनल वालों ने इस घटना के साथ जिस तरह नेताओं जैसा सलूक किया, वह अक्षम्य है। देश की मुख्यधारा की पत्रकारिता का दावा करने वाले मीडिया का यह हाल है। विचार के दरिद्र जैसे हमारे नेता वैसा ही विचारहीन मीडिया। 'द इंडियंस आर डॉग’ कहते कहते 'द स्लम डॉग’ पर आकर अभिव्यक्त होने वाली गोरों की घृणा के बरक्स गौरवान्वित होने और खींसे निपोर देने की हमारी नस्लीय गुलाम परम्परा पिछले दिनों ऑस्कर को लेकर किस तरह छलकी, वह अखबार और समाचार चैनलों के जरिए पूरे देश के सामने जाहिर हो गई। अब इस पर बहस छोड़ दें। अभी 25 फरवरी को बांग्लादेश में जो सैन्य विद्रोह की घटना घटी उसे उत्तर भारतीय मीडिया ने कोई तवज्जो नहीं दिया। जबकि पश्चिम बंगाल से निकलने वाले तमाम अखबारों, चाहे वह अंग्रेजी हो या बंगाली या हिंदी, सबने सैन्य विद्रोह की खबर को आठ-आठ कॉलम तक की लीड बनाई। अपनी अस्मिता की हिफाजत से जुड़े मुदूदे पर नेता और मीडिया इतना कैजुअल होगा, लापरवाह होगा, यह कितना दुखद है!...
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खबरें @ डेली न्यूज़ ऐक्टिविस्ट |

पैरों तले की घास ज्यादा न रौंदिए

जब सरकार को शर्म नहीं आती तो एडीएम अनिल पाठक को क्या आएगी! शिक्षक के सिर पर जूतों से वार करते हुए एडीएम अनिल पाठक की 'डेली न्यूज़ ऐक्टिविस्ट’ के पहले पेज पर फोटो छपी देख कर उन सब लोगों को शर्म आई जो आज शिष्य हैं या कभी न कभी शिष्य रह चुके हैं और गुरू के चरणों में शीश नवाने की परम्परा और संस्कार से सज्जित रहे हैं। नौकरशाहों की नस्ल-नलिकाओं में सत्ता जनित कुसंस्कार का जो रक्त प्रवाहित हो रहा है, उससे आम नागरिक भले ही लज्जित होता रहे, लेकिन इससे न तो सियासतदानों को लज्जा आती है और न उन अखबार वालों को, जिनके पास शिक्षक को जूतों से पीटते एडीएम की तस्वीरें फाइल तो हुईं पर फोटो छापने की हिम्मत नहीं हुई। ये वो अखबार हैं जो बड़ा होने का दंभ भरते हैं, पर व्यवहार में छोटी और घटिया हरकतें करते हैं। मीडिया द्वारा कोई खबर दबाना एडीएम अनिल पाठक के कुकृत्य से ज्यादा जघन्य है। सत्य का सिर कुचलने की हरकत शिक्षक के सिर पर जूते मारने के कृत्य से ज्यादा घृणित और निंदनीय है।
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खबरें @ डेली न्यूज़ ऐक्टिविस्ट |

लोकतंत्र की पीठ पर नीला निशान

मायावती की पुलिस की लाठियों से मार खाए नीला जख्म लिए इधर-उधर भागते चीखते लोगों को देख कर बेसाख्ता यह शेर मस्तिष्क में दहाड़ने लगा...

आंखें हैं पथराई हुई, नाखून हैं नीले से
यह शख्स भी लगता है अपने ही कबीले से...


धिक्कार दिवस, थू थू दिवस और पुलिस के लट्ठ दिवस के बीच उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती का जन्म दिवस...। यह हमारी शिक्षा है कि जन्मदिवस चाहे किसी का हो, हम उसे शुभकामना देते हैं, मुबारक कहते हैं, उसके प्रति मंगलकामना व्यक्त करते हैं। यह हमारी शिक्षा है कि हम धतकरमों में लगे या भटके हुए लोगों को अपनी आखिरी उम्मीद तक सही रास्ते पर लाने और उसके चरित्र में सकारात्मक परिवर्तन लाने की लौ जगाए रखते हैं। हम उसे ललकारते या उसकी थू थू इसीलिए तो करते हैं!
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खबरें @ डेली न्यूज़ ऐक्टिविस्ट |

मत करो परवाह कोई क्या कहेगा

हादसों और त्रासदियों से गुजरते हुए अनुभवों से हम यह जो पहले दिन का सूर्य देख रहे हैं, वह पहले जैसा नहीं है। कुछ नया कह रहा है, कुछ नया पूछ रहा है। सियासतगर्दी और दहशतगर्दी के वार से लहूलुहान जख्म लेकर हमने जो जश्नों से हट कर प्रश्नों से मुकाबला करने की बातें तय की थीं, साल का प्रारंभ उन्हीं सवालों को लेकर खड़ा है। लेकिन नागरिकों के कब्र पर नेता अपने जन्मोत्सव की तैयारियों में मशगूल हैं और हम नया साल मुबारक का मर्सिया पढ़ने में...
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खबरें @ डेली न्यूज़ ऐक्टिविस्ट |

सत्य को धिक्कारना नहीं है राजधर्म

मायावती जी को गुस्सा क्यों आता है? उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने वाली बहुजन समाज पार्टी के विधायक ने मुख्यमंत्री के 'बर्थ डे गिफ्ट’ के लिए धन उगाही के चक्कर में एक इंजीनियर की बर्बर हत्या कर दी। इस हत्या में विधायक के साथ-साथ प्रशासन तंत्र और पार्टी तंत्र दोनों शामिल था। यह उजागर होते ही लोगों का आक्रोश चढ़ गया और पार्टी का ग्राफ गिर गया। प्रदेश भर में वसूली के लिए मची सरकारी मारामारी की परतें उधड़ने लगीं तो मायावती जी को गुस्सा आना लाजिमी था...
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खबरें @ डेली न्यूज़ ऐक्टिविस्ट |

जल्लादों की बस्ती में हिफाजत की बातें...!

यह वैसे ही है जैसे फांसी घर से जीने की उम्मीदें रखना या हिफाजत की बातें जल्लादों से करना.. उत्तर प्रदेश में बसपाई सत्ता मदांध में हैं और नौकरशाही पट्टा बांधे पालतू पशु से भी गई बीती। ...और हम आप कायर भेंड़ों से बदतर। एक इंजीनियर की हत्या का वहशियाना तौर-तरीका खुद ही यह चीख-चीख कर बता रहा है कि धन वसूली का हवस कितनी घिनौनी शक्ल ले चुका है। इस हवस और मुंबई में हमला करने वाले आतंकियों के हवस में क्या कोई फर्क पाते हैं आप? सत्ता व्यवस्था पर काबिज नेता एक इंजीनियर को पीट-पीट कर महज इसलिए मार डाले कि उसने 'उपहार-बंदोबस्त’ में कोताही क्यों की, तो क्या यह देश में बाहर से सेंध लगा रहे आतंकियों से ज्यादा घातक नहीं है? प्रदेश भर में विधायक और नौकरशाह मिल कर 'बर्थ-डे गिफ्ट’ के लिए जो वसूली का आपराधिक अभियान चलाए बैठे हैं, वह जिस हवस का परिणाम है, क्या आप उसे देशद्रोही वहशियों से कहीं अधिक नुकसानकारी नहीं मानते?...
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खबरें @ डेली न्यूज़ ऐक्टिविस्ट |

उनके घर शीशे के तो हैं... पर बुलेट प्रूफ!

सुरक्षा को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार कितनी चौकस है। प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती का कार्यालय कक्ष और कॉन्फ्रेंस हॉल बुलेट प्रूफ कर दिया गया है। बुलेट प्रूफ दरवाजे और खिड़कियां जयपुर से बन कर और चंडीगढ़ से आजमा कर लाई और लगाई गई हैं। मुख्यमंत्री के अपने कार्यालय आने जाने के लिए एनेक्सी भवन के पीछे से विशेष सुरक्षित रास्ता बन ही चुका है। अब वे बुलेट प्रूफ गाड़ी से आएंगी, बुलेट प्रूफ कक्ष में बैठेंगी, बुलेट प्रूफ सभागार में अधिकारियों को संबोधित करेंगी और बुलेट प्रूफ गाड़ी से वापस बुलेट प्रूफ घर में चली जाएंगी। सुरक्षा तामझाम में मुख्यमंत्री मायावती प्रधानमंत्री के समकक्ष तो पहुंच ही चुकी हैं...
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खबरें @ डेली न्यूज़ ऐक्टिविस्ट |

फजीहत में हिफाजत

लखनऊ के अमौसी एयरपोर्ट पर सुरक्षाकर्मियों की भागदौड़ वाली यह जो तस्वीर आप देख रहे हैं, वह सुरक्षा के नाम पर नौटंकी का दृश्य है। इंडियन एयरलाइंस विमान अपहरण कांड के समय से ही लखनऊ एयरपोर्ट आतंकवादियों के निशाने पर है। तमाम खूंखार आतंकियों को लाने ले जाने का संवेदनशील काम भी इस एयरपोर्ट के जरिए हो रहा है। लखनऊ एयरपोर्ट के खतरे में होने की जाने कितनी खुफिया रपटें केंद्र व उत्तर प्रदेश सरकार की फाइलों में गुमशुदा हैं। मुंबई हमले के बाद खुफिया एजेंसियां आशंका भी जता चुकी हैं कि आतंकियों का अगला हमला या विस्फोट लखनऊ एयरपोर्ट पर हो सकता है। सब निश्चिंत हैं, पर इस बार खुफिया एजेंसियों के मत्थे ठीकरा फोड़ने का नेताओं का 'सस्ता सुंदर टिकाऊ’ फार्मूला नहीं चलेगा। लखनऊ के अमौसी एयरपोर्ट पर कोई विध्वंसक आतंकी धमाका हुआ तो उसकी जिम्मेदार उत्तर प्रदेश सरकार होगी...
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खबरें @ डेली न्यूज़ ऐक्टिविस्ट |

ब्लैक नवम्बर

सचमुच भारतवासियों के मुंह पर कालिख पुत गई। 26 नवम्बर की रात मुंबई की सड़कों पर जो कुछ घटा वह इतिहास के पन्नों पर 'ब्लैक नवम्बर’ बन कर दर्ज हो गया। देश की व्यवस्था में जो नेताओं की मर्दानगी का सीमेंट और गारा लगा है वह गोलियों और धमाकों में बिखर-बिखर कर सबूत दे रहा था कि कितना मजबूत और वीर्यवान है। हादसे के बाद नेताओं का टीवी पर आता चेहरा आपने अगर गौर से देखा तो उनमें और तालियां बजाते, हाथ नचाते नेग मांगते उभयलिंगियों के चेहरों में कोई फर्क पाया क्या! 2001 में अमेरिका की 9/11 घटना के बाद वहां कोई आतंकी हादसा नहीं हुआ। 9/11 को ही अगर हम मानक रखें तो भारत में ऐसे 'इलेवन’ की कतार लगी है। इसकी वजहों के बारे में फिर से बताने और लोगों के कभी नहीं समझने का सिलसिला चलाते रहने का अब वक्त नहीं। 9/11 की घटना के बाद अमेरिका ने अपने देश में रहने वालों के सामने साफ तौर पर अपनी आंतरिक सुरक्षा नीति स्पष्ट कर दी कि अमेरिका में रहना है तो अमेरिकी बन कर रहना होगा। इस साफ-साफ समझ को अमेरिका के नागरिकों ने पूरी शिद्दत से समझा और जिसने नहीं समझा उसे समझा दिया गया। अमेरिका के लोगों में वह दोगलापन भी नहीं भरा कि वह देश की सुरक्षा के मसले को सांप्रदायिकता और सस्ती सियासत के फ्रेम में रख कर देखे और वहां के राष्ट्राध्यक्ष या राजनीतिक भी देश के मसले में राजनीति की गंदी नाक नहीं घुसेड़ते...
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गृह सचिव के खिलाफ उच्चस्तरीय जांच

पुलिस भर्ती मामले में बिल्कुल नया मोड़ आ गया है। प्रदेश के गृह सचिव मोहम्मद जावेद अख्तर के खिलाफ उच्चस्तरीय जांच का आदेश जारी हो गया है। मायावती सरकार की विवशता उजागर हो गई है। जावेद अख्तर के खिलाफ जांच के लिए एडीजी मनोज कुमार की अध्यक्षता में चार सदस्यीय कमेटी गठित की गई है। पुलिस भर्ती मामले की प्राथमिक जांच करने वाले एडीजी शैलजाकांत मिश्र को यह निर्देश दिया गया है कि जावेद अख्तर से संबंधित फाइल तत्काल नवगठित कमेटी के सुपुर्द कर दी जाए। शैलजाकांत मिश्र कमेटी ने सरकार के इशारे पर जावेद अख्तर को क्लीन चिट दे रखी थी...
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कहां दीप और कहां दीवाली...

मां ने बच्चे को समझाया बहुत देर तलक
जगमग रौशनी चकमक चेहरों और
इस जश्न का मतलब...
अब न दुख ओ तकलीफ के आंसू होंगे
न होंगे किसी शहर में दहशत के निशां
रूख-ए-मासूम पर हैरत की लकीरें उभरीं
और फिर डूब गईं...
...मां ने शायद अभी अखबार नहीं देखा है...

दीपावली की सुबह देश के सारे अखबार बचकानी हरकत करने वाले एक मासूम युवक की मुम्बई में की गई हत्या की खबर से भरे थे और उसे पढ़ने वाले लोग मायूसियत और तकलीफ से। हम नेताओं को चुनते हैं और नेता हमें मारने के लिए चुनते हैं। अपराधी हों या आतंकवादी सब इनके हथियार हैं। ...और पुलिस की तो बात ही न करें, उससे तो वेश्या अच्छी...
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कहां टिकेगा देश कहां टिकेंगे हम

वह परिवार बेहतर जिंदगी की तलाश में राजस्थान से दिल्ली आया था। उसे यहां बदतर मौत हासिल हुई। धर्म का यह चेहरा जो धमाकों में छरर बन कर उड़ता बिखरता है और मासूमों के शरीर में मौत की मानिंद जा धंसता है वह उन्हें क्यों नहीं दिखता जो सानिया मिर्जा की स्कर्ट में ताकते-झांकते हैं और फतवे जारी कर अपनी कुंठा की अभिव्यक्ति देते हैं! निर्लज्ज धमाकों के पीछे कौन हैं यह उन्हें क्यों नहीं दिखता जो आतंकवाद पर बहस-मुबाहिसे आयोजित करते कराते हैं और वाक-मैथुन का बेशर्म सुख लेकर अपने अपने घरों में जा सिमटते हैं! दिल्ली की सड़क पर जाहिलाना कृत्य का शिकार रक्तरंजित महिलाओं की पीड़ा उन शबानाओं को क्यों नहीं दिखती जिनका जघन्य धार्मिक रूदन भारतीयों को सरेआम शर्मसार करता रहता है...
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अनैतिक धर्म का कर्म है मासूमों की हत्या

मैं किसी भी धर्म का नहीं हूं। मैं किसी जाति का नहीं हूं। आजाद विचारों की सुवासित हवा का झोंका चिंतन को निरंतर ताजगी देता रहे इसके लिए दिमाग की खिड़कियां खुली रखने में भरोसा करता हूं और इसकी कोशिश में लगा रहता हूं। मैं इसलिए नहीं लिखता कि लोग मुझे प्रगतिशील कहें। मैं इसलिए नहीं लिखता कि लोग मुझे कट्टरपंथी कहें। ये दोनों विचारधाराएं 'ढक्कन-बंद’ मनोविज्ञान हैं। इसमें जिस जमात ने प्रगतिशीलता का चोला पहन रखा है, वह अधिक घातक है। जो नंगा है उसे तो सब जानते हैं लेकिन जिसने छद्म ओढ़ रखा है उसे आप जानेंगे कैसे! इस छद्म प्रगतिशीलता और नंगी कट्टरवादिता ने सच पर पहरा बिठा रखा है। इस देश में कहने भर को आजादी है। कहने भर के लिए बोलने की लिखने की स्वतंत्रता है। लेकिन आप सच बोल कर देखिए। देखिए कि कितने पहरे हैं। हां, इस देश में झूठ लिखने-बोलने की पूरी आजादी है। आप जो चाहें बोलें, लिखें... मक्कारी होनी चाहिए, बस। आप रंगे सियार हों तो समाज में आपकी चल निकलेगी, बुद्धिजीवी जगत में, साहित्य में, पत्रकारिता में आपकी चल निकलेगी। राजनीति में तो बस दौड़ ही पड़ेगी। समाज की हर विधा में आज इसी निकृष्ट योग्यता की अनिवार्यता है...
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उड़ान भरने वालों को अब धड़ाम का भय

प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती की उड़ान-सुरक्षा में बरती गई भीषण कोताही उजागर होते ही उड्डयन महकमे के कई विमान बेच डालने की हरकतें तेज हो गई हैं। उड्डयन के अलमबरदारों को अब यह भय सताने लगा है कि सब बंटाधार न हो जाए, लिहाजा कारगुजारियों का पहाड़ समेटने की जल्दी मची है। उड्डयन महकमा भ्रष्टाचार की प्रयोगशाला रहा है। विमानों की खरीद के नाम पर कबाड़ जमा करना ही एक मसला नहीं है, आप परतें खोलते जाएं, आपको सड़ांध मारते तमाम कारनामे मिलते चले जाएंगे...
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मायावती की तो जान ही ले लेते!

एक सितम्बर की रात प्रदेश में एक बड़ा हादसा हो सकता था। जो नौकरशाह मुख्यमंत्री की हिफाजत के प्रति आधिकारिक तौर पर जवाबदेह हैं वे अपनी गैरजिम्मेदाराना हरकतों से उस दिन मुख्यमंत्री मायावती की जान ही ले लेते। वीवीआईपी उड़ान की उच्च संवेदनशीलता के बावजूद उस दिन जिस स्तर की खतरनाक तकनीकी चूक की गई, वह उड्डयन इतिहास का नायाब पन्ना है। जिस सिंगल इंजिन हेलीकॉप्टर पर मुख्यमंत्री मायावती को बैठा कर रात में संत कबीर नगर और फैजाबाद ले जाया गया, उस हेलीकॉप्टर के लिए रात की फ्लाइंग कानूनन प्रतिबंधित है। उसमें रात्रि उड़ान के उपकरण हैं ही नहीं। रात में जब मुख्यमंत्री को लेकर वही हेलीकॉप्टर संत कबीर नगर से उड़ा तो टेक-ऑफ के लिए कारों की बत्तियां जलानी पड़ीं। फिर फैजाबाद में नाइट लैंडिंग का खतरनाक जोखिम उठाया गया। उसके बाद लखनऊ से गए विमान से मायावती वापस लौटीं। बात यहां खत्म नहीं होती। बात यहीं से शुरू होती है...
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काश बिहारियों की मूढ़ता धो सकती बाढ़!

बिहार सम्पूर्ण भ्रांति में घिसटता हुआ भीषण सामाजिक अन्याय का प्रदेश रहा है, रखा गया है और उसे ऐसा ही बनाए रखा जाएगा। आजादी के बाद से अब तक जितने भी 31 मुख्यमंत्री हुए, श्रीकृष्ण सिंह से लेकर कृष्ण वल्लभ सहाय, बीपी मंडल और कर्पूरी ठाकुर, जगन्नाथ मिश्र से लेकर लालू यादव और नीतीश कुमार तक सब एक ही धूर्त नस्ल के रहे हैं। इनकी मक्कारी के कारण पैदा होती रही सिलसिलेवार वजहों से बिहार आज इस दुर्दशा तक पहुंचा है और विध्वंस की चरम स्थिति तक जल्दी ही पहुंचने वाला है। बिहार की इस नकारात्मक विकास-यात्रा के संवाहक लीडरों में इतनी भी पुंसकता नहीं कि वे इस पर सार्थक बहस में उतरने का साहस करें। वे बहस में उतरने का केवल स्वांग भरते हैं। दरअसल वे बहस में नहीं, कलह में उतरते हैं। एक दूसरे को गरियाते हैं। बेटी-रोटी करते हैं या कमजोर पड़ने पर हास्य अभिनेता के भौंडे रोल में उतरने से जरा भी नहीं हिचकते। बिहार में बाढ़ मुद्दा जरूर है। लेकिन आप बताएं कि बिहार में क्या मुद्दा नहीं है। यह अलग बात है कि मुद्दा बनता नहीं है...
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