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अपने चेहरे से हम नकाब तो हटाएं...

वोट डालते समय मतदाता के चेहरे पर बुर्का रहे या नहीं, इस पर फैसला देते हुए देश की सर्वोच्च अदालत ने साफ-सुथरे नकाब ओढ़े देश के राजनीतिकों के बारे में कुछ भी नहीं कहा। सुप्रीमकोर्ट ने यह जरूर साफ-साफ कहा कि भारतीय लोकतंत्र में कोई भी मतदाता बुर्का पहन कर वोट नहीं डाल सकती, क्योंकि इससे महिला मतदाता की पहचान की प्रक्रिया बाधित होती है। लिहाजा मतदाता पहचान पत्र पर फोटो लगाने से लेकर वोट डालने तक महिला मतदाता का चेहरा बुर्के से ढंका नहीं रहेगा। यह निर्णायक फैसला जारी करते हुए देश के सर्वोच्च न्यायाधीश केजी बालकृष्णन और न्यायाधीश दीपक वर्मा ने ठीक ही कहा कि यदि भावना अत्यधिक प्रबल हो तो उस महिला को वोट डालने ही नहीं जाना चाहिए जिसे लोगों के सामने या मतदान कर्मियों के सामने अपना चेहरा दिखाने पर आपत्ति हो।

सुप्रीमकोर्ट का यह सही फैसला सही समय पर आया है जब देश की सुरक्षा और अस्मिता बहुत ही नाजुक समय से गुजर रही हो। लेकिन इस फैसले से एक बड़ा सवाल अनुत्तरित रह गया, जबकि उस पर बहस जरूरी है कि आखिर हम उन नेताओं के असली चेहरे कैसे पहचानें जिन्होंने आजादी के बाद से आज तक छद्‌म (नकाब) ही ओढ़े रखा है! बुर्का पहनना या महिलाओं का नकाब ओढ़ना धर्म से जुड़ा मामला नहीं है। यह महज और महज असली और नकली या आम और खास में फर्क के लिए चलन में लाया गया था। ईसा से 13वीं सदी पूर्व असीरियाई सभ्यता के दस्तावेजों में सबसे पहले बुर्का के चलन का जिक्र आता है। उस समय कुलीन और चर्चित महिलाओं के बुर्का पहनने का चलन था जिससे आम औरतों और वेश्याओं की समाज में पहचान रह सके। प्राचीन यूनानी ग्रंथों में भी फारसी कुलीन महिलाओं व अन्य महिलाओं में भेद के लिए बुर्के के इस्तेमाल का जिक्र आता है।

लेकिन भारतवर्ष में क्या हुआ? देश के राजनीतिकों ने ही अपना चेहरा ढांप लिया। आधुनिक काल को यदि हम भारत की आजादी के उत्तर-काल से आंकें तो तबसे लेकर आज तक हम देश के राजनीतिकों का असली चेहरा कहां देख पाए। हम केवल उनकी भयानक करतूतों से यह जानते हैं कि जो सामने दिखता है वह इनका असली चेहरा नहीं है। नेताओं के असामाजिक, अमानवीय, अनैतिक और अराष्ट्रीय कृत्यों की विद्रूप असलियत और सामने दिखते उनके भद्र कुलीन चेहरे। संस्कृत में कहते हैं...यथा राजा तथा प्रजा... जैसा राजा होगा प्रजा वैसी ही होगी या वैसी ही मानी जाएगी। भारतवर्ष में यही हो रहा है। आडंबर से भरी राजनीति कई देशों में विचार का मसला रही है, लेकिन भारतवर्ष के लिए तो यह अत्यंत घातक साबित हो रहा है। आडंबर और छद्‌म से भरी राजनीति ने करीब-करीब पूरे भारतीय समाज को ग्रस लिया है। आप उस भयावह स्थिति की कल्पना करें जब भारतवर्ष का सम्पूर्ण समाज शत-प्रतिशत कृत्रिमता में रूपांतरित हो जाएगा।

राजनीतिकों ने देश की नसों में छद्‌म और नपुंसकता का जहर कितना भर दिया है इसका अंदाजा हम देश की तथाकथित आजादी से लेकर आज तक, पूर्वोत्तर में चीनी हमले से लेकर जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान पोषित आतंकी युद्ध तक, राष्ट्रीय गौरव लाल किले से लेकर राष्ट्रीय संसद पर आतंकी प्रहार तक और आर्थिक राजधानी मुंबई पर आतंकवादी हमले से लेकर आम आदमी पर हर दिन बरसते मृत्यु-कहर तक छाई अपनी कायरना चुप्पी और नेताओं की शातिराना चुप्पी से भली भांति समझ सकते हैं। देश पर तेजी से छा रहे अज्ञानता के स्याह अंधेरे को लेकर चिंता तो खूब जताई जाती है, लेकिन देश के लोगों को असलियत दिखाने या समझाने के बजाय उन्हें आधुनिकता, विकासशीलता और प्रगतिशीलता के आकर्षक आडंबर में फंसा कर और सुरंग में धकेलने का इंतजाम किया जाता रहा है। हम भी अपनी नियति मान चुके हैं कि हम देश के दोयम दर्जे के नागरिक हैं। हमारी नसों में दोयम दर्जे का खून बहता है। आधुनिकता और प्रगतिशीलता का नकाब हटा कर हम खुले में नहीं आ सकते। लोकतंत्र में मतदाता का चेहरा पहचानने की जरूरत पर सुप्रीमकोर्ट ने जो आधारभूत फैसला दिया है उसमें देश की पीड़ा और देश को उस कष्ट से मुक्त कराने की पुकार अंतरनिहित है।

ध्यान रहे... यह कोई परोपदेश या प्रवचन का सत्र नहीं है। खुद को नैतिकता के ऊंचे मंच पर महिमामंडित कर दूसरों को सीख देना भी उद्‌देश्य नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के जरिए जो सांकेतिक चुनौतियां सामने दिख रही हैं, उसे सबके साथ देखना और चुनौती से दो-दो हाथ करने के बारे में विचार करना और खुद को मजबूत करना... यही सीधा और स्पष्ट उद्‌देश्य है। देश को रसातल में ले जा रहे निकृष्ट राजनीतिकों के समानान्तर उत्कृष्ट विकल्प खड़ा करने के बजाय हम ऐसे निकृष्टों के साथ प्रतियोगिता में उतर आए हैं और चमकदार और रंगीनियों से भरा दिखने वाला आडंबर असाध्य महामारी की तरह हमें अपने चंगुल में कसता चला जा रहा है। इससे उबर पाना मुश्किल है। जितनी देर होती जाएगी छद्‌म ही जीवन के यथार्थ की तरह हमारे चेहरे से चिपक कर रह जाएगा। इसे हटाने के लिए आत्ममंथन का जबरदस्त दमखम और अपनी खामियों से लड़ने की पुरजोर ताकत चाहिए। तब हम अपने देश और समाज की महानता स्थापित कर सकते हैं। राजनीतिक त्यज्य हैं, पर राजनीति नहीं। राजनीति का शुद्धिकरण करना है, देश और समाज अपने आप शुद्ध होने लगेगा... हम कोशिश तो करें... अपने चेहरे से नकाब तो हटाएं... सारे नकाब खुद ब खुद हटने लग जाएंगे... अपने आप छद्‌म की छाया छंटने लगेगी...

(Published in By-Line National News Weekly (Hindi and English) February 06, 2010 Issue under regular column - अंत-अनंत)


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