Home | Contact
  My Profile
  Aired News
  Contact
  News/Articles


Loading...


News / Articles

लाल दरार

» भारत व नेपाल के माओवादियों की राहें अब अलग-अलग

» माओवादी कैडर भोले-भाले आदिवासियों को गुमराह कर हिंसा और राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों के लिए उकसा रहे हैं

» भारत और नेपाल दोनों ही देशों की सरकारों को माओवादियों से निपटने में भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ा है

» भारतीय माओवादियों और नेपाली माओवादियों के बीच हुए इस अलगाव से आंध्रप्रदेश के तेलंगाना से लेकर महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, बिहार और उत्तर प्रदेश होते हुए नेपाल तक ‘माओवादी गलियारा’ स्थापित करने के नक्सली प्रयासों को ब्रेक लग गया है

» माओवादी नेता बाबूराम भट्‌टराई तक ने कहना शुरू कर दिया कि भारतीय सेना माओवादी गुरिल्ला दस्ते व पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के नेपाल की नियमित सेना में विलय का विरोध कर रही है। नेपाल के अंदरूनी मसलों और गतिविधियों को रॉ से जोड़ दिए जाने के कारण भारत को अपनी कूटनीतिक गतिविधियां तेज करनी पड़ी हैं

» भारत के माओवादी नेताओं ने नेपाली गुरिल्लों को दोबारा हथियार उठाने के लिए उकसा कर नेपाल के लिए मुसीबत खड़ी कर दी है। नेपाल के माओवादी नेताओं पर कांग्रेस-सपा-भाजपा से साठगांठ के आरोप भी लग रहे हैं

भारत और नेपाल के माओवादियों के बीच विभाजन हो गया है। दोनों के रास्ते अलग-अलग हो गए हैं। नक्सल आंदोलन से जुड़े संगठनों केलिए यह फूट भले ही नुकसानदायक साबित हो रही हो, पर नक्सलियों से निपटने में लगी केंद्र सरकार के लिए यह फायदेमंद साबित हो रही हैं। इतना ही नहीं, इस अलगाव से विश्व स्तर पर अति-वामपंथी आंदोलन से जुड़े संगठनों में भी साफ-साफ विभाजन रेखा खिंच रही है। इटली की कम्युनिस्ट पार्टी ‘एनपीसीआई’ ने भारतीय माओवादियों की ‘लाइन’ को अपना समर्थन भी दे दिया है। कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी) के अंदर से भी दरकने की आवाजें आने लगी हैं। भारतीय माओवादियों और नेपाली माओवादियों के बीच हुए इस अलगाव से आंध्रप्रदेश के तेलंगाना से लेकर महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, बिहार और उत्तर प्रदेश होते हुए नेपाल तक ‘माओवादी गलियारा’ स्थापित करने के नक्सली प्रयासों को ब्रेक लग गया है। गृह मंत्रालय में नक्सल मामले देखने वाले एक आला अधिकारी भारत के विदेश मंत्री एसएम कृष्णा की ‘उत्साही’ नेपाल यात्रा के पीछे इस अंदरूनी किन्तु बड़े ‘डेवलपमेंट’ को बड़ी वजह बताते हैं। माओवादियों के हथियार डालने के नेपाली फार्मूले को अख्तियार करने की भारतीय कोशिशें औपचारिक शक्ल ले पाएं इस पर भी प्रशासनिक-राजनीतिक-कूटनीतिक जद्‌दोजहद जारी है। लेकिन भारत के माओवादियों ने पैंतरा बदल कर अपना हथियार डालने के बजाय उल्टा नेपाल के ही पीपुल्स लिबरेशन आर्मी को फिर से हथियार उठाने और माओवादी नेता व पूर्व प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहाल उर्फ प्रचंड के खिलाफ खड़े होने के लिए उकसाना शुरू कर दिया है। भारतीय माओवादी नेपाल के माओवादी नेताओं पर कांग्रेस पार्टी से लेकर समाजवादी पार्टी और धुर दक्षिण पंथी भारतीय जनता पार्टी तक से घालमेल करने का ‘आरोप’ लगा कर सीपीएन (माओवादी) में सैद्धान्तिक संकट और कलह की स्थिति पैदा कर रहे हैं।

भारत और नेपाल के माओवादियों में हो रहे परोक्ष युद्ध का यह अजीबोगरीब पहलू है कि भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) भारत के खिलाफ आग उगल रही है और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओवादी) पर ‘साम्राज्यवादी-विस्तारवादी’ भारत सरकार से साठगांठ करने का आरोप लगा रही है। भारत के माओवादी नेता भारत को षडयंत्रकारी-विस्तारवादी और चीन को ‘बड़ा पड़ोसी’ बता रहे हैं। जबकि चीन के ठप्पे से बचने के लिए नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी अपने नाम के पीछे लगे ‘माओवादी’ शब्द को हटाने का प्रस्ताव ला रही है। सर्वहारा के लिए हथियारबंद क्रांति की बात करने वाले अति-वामपंथी पुरोधा एक दूसरे पर उंगली उठाए वाक-युद्ध में लगे हैं। बौखलाहट इसलिए भी है कि गुरिल्ला युद्ध में माहिर नेपाली माओवादियों की मदद से सीपीआई (माओवादी) ‘साम्राज्यवादी-विस्तारवादी भारत सरकार’ के खिलाफ साझा युद्ध छेड़ने की योजना बना रही थी। भारत सरकार के खिलाफ साझा युद्ध छेड़ने के प्रस्ताव पर कोऑर्डिनेशन कमेटी ऑफ माओइस्ट पार्टीज़ एंड ऑर्गेनाइजेशन ऑफ साउथ एशिया (कोकोमपोसा) में मुहर लगाने के समीकरण भी फिट कर लिए गए थे। लेकिन सीपीएन (एम) ने इस प्रस्ताव पर अपनी सहमति नहीं दी। यहां तक कि सीपीआई (एम) सेंट्रल कमेटी ने भारत और नेपाल के माओवादियों को आपस में पहले की तरह साझेदारी से चलने की जरूरत के बारे में सीपीएन (एम) को पत्र भी लिखा, फिर भी नेपाली माओवादियों ने उस पर कोई तवज्जो नहीं दिया। इसने भारत के माओवादियों को भीषण नाराजगी से भर दिया है। वे दस्तावेज उपलब्ध हैं जिन पर सीपीआई (माओवादी) के भूमिगत महासचिव गणपति और प्रवक्ता आजाद दोनों ही, नेपाल के माओवादियों से रास्ता अलग करने की आधिकारिक पुष्टि करते हैं। आजाद तो यहां तक कहते हैं कि भारत और नेपाल के माओवादियों के बीच गहरी खाई बन गई है।

साझीदार रहे हैं दोनों माओवादी

नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) का कहना है कि पार्टी ने कट्‌टर मशीनी तरीके से माओवाद नहीं अपनाया तो भारतीय माओवादी नाराज हो गए। जबकि इसके प्रामाणिक तथ्य मौजूद हैं कि नेपाली और भारतीय माओवादी हथियारबंद कैडर कई ऑपरेशनों में साझा तौर पर शरीक रहे हैं। यहां तक कि नेपाल के अंदर हुए कई ऑपरेशनों में भी भारतीय माओवादियों ने सक्रिय हिस्सा लिया है। खुफिया एजेंसियों की रिपोर्टों के आधार पर केंद्र को यह पता है कि पीपुल्स वार ग्रुप (पीडब्लूजी) और माओइस्ट कम्युनिस्ट सेंटर (एमसीसी) के विलय व सीपीआई (माओवादी) के अस्तित्व में आने के बाद उड़ीसा, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ में हुए कई ऑपरेशंस में नेपाली माओवादी बराबर से शरीक होते रहे हैं। जहानाबाद जेल हमला कांड में नेपाल के माओवादी छापामारों की हिस्सेदारी के प्रमाण खुफिया एजेंसियों के पास हैं। खुफिया एजेंसियां कहती हैं कि सीपीआई (माओवादी) के गठन में भी सीपीएन (एम) की सक्रिय भूमिका रही है। युनिटी कांग्रेस में नेपाली माओवादी नेता भी गुपचुप शामिल हुए थे। ‘कोकोमपोसा’ में भारतीय और नेपाली माओवादियों की साझा ताकत अपनी शिनाख्त बनाती रही है। लेकिन अब यह साझीदारी-हिस्सेदारी नहीं हो पाएगी। परिदृश्य बिल्कुल बदल गया है।

नेपाल सरकार की पहल पर संयुक्त राष्ट्र की निगरानी में हथियार डालने वाले पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के लड़ाकू काडरों को फिर से हथियार उठाने के लिए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) द्वारा उकसाए जाने को भारत सरकार ने काफी गंभीरता से लिया है। इंटेलिजेंस ब्यूरो के एक आला अधिकारी ने वे दस्तावेज दिखाए जिसमें सीपीआई (माओवादी) नेताओं ने पीएलए को फिर से हथियार उठाने के लिए उकसाया है। हथियार डालने वाले पीएलए कैडरों को संयुक्त राष्ट्र की निगरानी बैरकों में रखे जाने को भारतीय माओवादी गिरफ्तारी बता रहे हैं। हथियार डाल चुके पीएलए कैडरों को नियमित सेना में शामिल करने के प्रचंड के प्रस्ताव और पहल को खारिज करते हुए भारत के माओवादी नेताओं ने जो पर्चे नेपाली पीएलए कमांडरों तक पहुंचवाए हैं उनमें पीएलए के ‘बेस एरियाज़’ को भंग किए जाने और पीएलए को निशस्त्र (डिज़ार्म) किए जाने के खिलाफ कैडरों को भड़काया गया है। कहा गया है कि किसी भी क्रांति का मुख्य लक्ष्य सुरक्षा बलों का हथियार छीनना होता है न कि खुद हथियार डाल देना।

ऐसे भड़काया नेपाली माओवादियों को

» भारत और अमेरिका की साजिश से हुई थी नेपाल राज परिवार की सामूहिक हत्या
» रॉ ने कराया नेपाल की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के हथियारबंद काडरों का समर्पण
» डीडीआर फार्मूले पर भारत के नक्सलियों से भी हथियार डलवाने की हो रही है तैयारी
» असली लड़ाई नेपाल का राजतंत्र ध्वस्त करना नहीं बल्कि भारत से लड़ना है


ग्रामीण और पिछड़े इलाकों से ताकतवर होकर बेस एरिया सुदृढ़ करते हुए कस्बों शहरों को अपने घेरे में लेते हुए और जनविद्रोह भड़काते हुए आखिरी लड़ाई में सीपीएन (एम) ने जो देशव्यापी जीत जिस पीएलए और यूथ कम्युनिस्ट लीग के कारण हासिल की उसे ही भंग कर दिया। भारत के खिलाफ भारतीय माओवादियों की अतार्किक नाराजगी यह है कि नेपाली पीएलए कैडरों का हथियार जमा कराए जाने को वे भारतीय खुफिया एजेंसी ‘रिसर्च एंड एनालिसिस विंग’ (रॉ) की साजिशों का परिणाम बताते हैं। सीपीआई (एम) के नेता साम्राज्यवादी एजेंसी संयुक्त राष्ट्र की निगरानी में पीएलए कैडरों के हथियार जमा कराए जाने और कैडरों को सैनिक बैरकों में रखे जाने के पीछे ‘रॉ’ की भूमिका मानते हैं। भारत के माओवादी नेताओं ने पीएलए कैडरों को उकसाते हुए उनसे पूछा है कि ‘प्रतिक्रियावादी-ताकतों’ का अगर उन पर हमला हो गया तो वे हथियार कहां से लाएंगे? क्रांतिकारी पीएलए और नेपाली सेना के विलय के बाद सेना का वर्ग चरित्र क्या होगा और उसकी गारंटी कौन लेगा? सत्ता से बाहर हुए माओवादी यह कैसे तय करेंगे कि सेना का अधिकांश हिस्सा माओवादी क्रांतिकारी वाला है या प्रतिक्रियावादी?

इसकी क्या गारंटी है कि वह सेना इंडोनेशिया और चिली की तरह माओवादियों पर कहर नहीं ढाएगी? आज भी रॉयल नेपाल आर्मी नेपाली सत्ता का मजबूत दुर्ग है। जबकि पीएलए एक कातर दर्शक की भूमिका में। अगर नेपाली सेना प्रतिक्रियावादी ताकतों और साम्राज्यवादी भारत की शह पर तख्ता पलट करे तो माओवादी अपनी हिफाजत कैसे करेंगे?

उकसावे की हद यह है कि भारत के माओवादी नेता नेपाल नरेश वीरेंद्र विक्रम शाह परिवार की सामूहिक हत्या और तख्ता पलट को भारत और अमेरिका की साझा साजिश का परिणाम बता रहे हैं। नेपाली माओवादियों को भेजे गए ऐसे कई आपत्तिजनक दस्तावेज खुफिया एजेंसी के अधिकारी ने दिखाए जिसमें नेपाली राज परिवार की हत्या में भारत और अमेरिका का हाथ बताया जा रहा है। इसी में यह भी कहा गया कि भारत और अमेरिकी सेना के सीधे हस्तक्षेप की तैयारियों के कारण माओवादी संघर्ष निणार्यक दौर तक नहीं पहुंच पाया। ऐसा कहते हुए सीपीआई (एम) नेताओं ने पीएलए और भंग यूथ कम्युनिस्ट लीग के कैडरों को हथियार लेकर निकल आने, दोबारा संघर्ष छेड़ने और 80 फीसदी से अधिक भूक्षेत्र पर कब्जा कर राजनीतिक सत्ता हासिल करने के लिए उकसा दिया है। नेपाल की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी को उकसाने और भड़काने वाले दस्तावेजों को इंटेलिजेंस ब्यूरो के अधिकारी भारत-नेपाल के आंतरिक पारंपरिक सम्बन्धों के लिए अत्यंत घातक बताते हैं। वे कहते हैं कि इस उकसावे का असर सेना में विलय के इंतजार में नेपाल के जंगलों में पड़े 20 हजार से अधिक पीएलए कैडरों पर भी पड़ सकता है। इसी उकसावे पर नेपाल के प्रमुख माओवादी नेता बाबूराम भट्‌टराई तक ने कहना शुरू कर दिया कि भारतीय सेना माओवादी गुरिल्ला दस्ते व पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के नेपाल की नियमित सेना में विलय का विरोध कर रही है। दूसरी तरफ नेपाल के अंदरूनी मसलों और गतिविधियों को रॉ से जोड़ दिए जाने के कारण भारत को अपनी कूटनीतिक गतिविधियां तेज करनी पड़ी हैं। इसी उकसावे का परिणाम है कि नेपाल में भारत के राजदूत राकेश सूद को जासूस तक करार दे दिया गया और भारतीय राजदूत को सीपीएन (एम) नेता प्रचंड के घर जाकर इसकी कूटनीतिक-रफूगीरी करनी पड़ी।

भारत के माओवादी नेता नेपाल में भारत सरकार की ओर से नेपाल पुलिस अकादमी बनाए जाने को भी इसी संदेह के घेरे में रख कर देख रहे हैं। इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) के एक अधिकारी ने यह जरूर कहा कि नक्सलियों से हथियार डलवाए जाने के ‘डीडीआर’ फार्मूले पर विचार हो रहा है। नक्सलियों से निबटने के लिए सशस्त्र कार्रवाई के बजाय केंद्र सरकार ‘डिज़ार्म-डीमोबिलाइज़-रीइंटिग्रेट’ (डीडीआर) फार्मूले को अधिक मुनासिब मानती है।

हथियार लेने और ठिकानों का विघटन करने के बाद कैडरों को नौकरी देकर मुख्य धारा में लाने के फार्मूले को जम्मू कश्मीर में भी आजमाया जा रहा है। लेकिन इस फार्मूले पर भारत के माओवादी नेताओं को विरोध है। यह उनका विरोध है या डर...? जो दस्तावेज उपलब्ध हैं वे इन नेताओं का डर ही जाहिर करते हैं। यह डर उनके इशारों पर नाचने वाले हथियारबंद कैडरों के उनके हाथ से निकल जाने की आशंका का है। यह डर बेमानी के थके हुए दिवास्वप्न दिखा कर चलाई जा रही ‘दुकान’ के बंद हो जाने का है। इसीलिए वे नेपाली माओवादियों को भड़काने के बहाने अपनी दुकान बचाए रखना चाहते हैं। भारतीय माओवादी नेताओं के इस उकसावे के निहितार्थ आसानी से समझे जा सकते हैं कि वे नेपाली माओवादियों से यह कह रहे हैं कि ‘असली लड़ाई नेपाल की राजशाही को ध्वस्त करने की नहीं थी। असली लड़ाई तो साम्राज्यवादी भारत के खिलाफ लड़ी जानी है।’

दहल का प्रचंड विरोध

भारत के माओवादी नेताओं में व्यक्तित्व का संकट इतना गहरा गया है कि उनकी सारी क्रांति ‘प्रचंड-पाथ’ का दुनिया भर में विरोध करने, नेपाल में पार्टी-विद्रोह कराने और नेपाली माओवादी नेता प्रचंड को दक्षिण एशिया का गोर्बाचोव साबित कर खारिज कराने के तिकड़मों पर केंद्रित हो गई है। भारत के माओवादी नेताओं को इस बात पर आपत्ति है कि नेपाली क्रांति के दरम्यान जो जमीनें और सम्पत्तियां जब्त की गई थीं वे वापस क्यों लौटाई गईं। वे प्रचंड पर भारतीय साम्राज्यवादियों से समझौता करने का आरोप लगाते हैं और कहते हैं कि ऐसा करके प्रचंड ने नेपाल के लोगों की क्रांतिकारी ताकत को बाधित किया जिसके लिए 13 हजार लोग शहीद हुए। सीपीआई (एम) के नेता इसे नेपाली क्रांति का गर्भपात बताते हैं।

‘प्रचंड-पाथ’ को ग्लासनोस्त-पेरेस्त्रोइका साबित करने के एक सूत्री अभियान में जुटे भारतीय माओवादी नेता अप्रैल 2008 के चुनाव में जीत के बाद सीपीएन (एम) के साथ गठबंधन में शामिल की गई पार्टियों को जन विरोधी, सामंती, साम्राज्यवादी और भारत-समर्थक बता रहे हैं और प्रचंड पर भारत की तरह बोलने और भारत की तमाम दक्षिणपंथी पार्टियों से साठगांठ करने के साथ-साथ अमेरिका के ‘गुड-बुक’ में रहने का आरोप लगा रहे हैं। दूसरी तरफ यह भी कह रहे हैं कि प्रचंड के सरकार से हटने के पीछे भारत सरकार, अमेरिका और स्थानीय प्रतिक्रियावादी तत्वों की साजिश है। ऐसे ही वैचारिक घालमेल और विरोधाभास में दोनों देशों का माओवादी आंदोलन अपने मायने खो रहा है।

नक्सल मामले देखने वाले आईबी के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि भारत के कुछ माओवादी नेताओं को प्रचंड से एलर्जी है। इसी वजह से वे नेपाली नेताओं को यह कह कर उकसा रहे हैं कि वामपंथी आंदोलन में ‘पर्सनालिटी कल्ट’ उचित नहीं है और एक व्यक्ति पर भरोसा नहीं करना चाहिए। लेकिन मार्क्स, लेनिन और माओ जैसे तमाम व्यक्तित्वों की लंबी श्रृंखला वामपंथी आंदोलन में कैसे स्थापित हुई और इन पर कैसे भरोसा किया जाता रहा, इसका जवाब भारत के विचारवान माओवादी नेताओं के पास नहीं है। लेकिन यह भी सही है कि भारत के माओवादी नेताओं के उकसावे का सीपीएन (एम) पर असर भी पड़ा है। पार्टी में प्रचंड विरोधी आवाजें मुखर होने लगी हैं। सीपीएन (एम) सेंट्रल कमेटी के सदस्य मात्रिका यादव के पार्टी से निष्कासन को भी विद्रोह का ही परिणाम बताया जा रहा है। सीपीएन (माओवादी) के विदेशी मामलों के सचिव चंद्र प्रकाश गजुरेल और मोहन वैद्य जैसे वरिष्ठ नेपाली माओवादी नेताओं को भी ‘प्रचंड-पाथ’ की मुखालफत करने वाली जमात का बताया जा रहा है। भारत के माओवादी नेताओं की तरह इन्हें भी मोहन बिक्रम सिंह के गुट ‘मशाल’ के साथ हुए गठजोड़ पर नाराजगी है।

(This Cover Story of Prabhat Ranjan Deen was Published in By-Line National Weekly News Magazine (Hindi & English) - in January 30, 2010 Issue)


खबरें @ बाई-लाईन | comments (0)

News management powered by Xpression News

News Headlines

News Categories





My ProfileMy Vision | My Philosophy of Life | PRD in the Eyes of... | News/Articles | Aired News
© 2008-2009 All rights reserved. Site Developed by Anshu Pranjal and Designed by Sanjay Jaiswal