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| इस मौन को धिक्कार है... |
मैं यह समझ पाने में असमर्थ हूं कि आखिर भारतवर्ष के लोगों को हो क्या गया है? हमारी संवेदनशीलता कहां खो गई है? आप निश्चित मानिए कि जो भी समाज राष्ट्रीयता की भावना से रिक्त हुआ, उसका विनाश तय है। भारतीय समाज का तेजी से होता हुआ विघटन आप देख ही रहे हैं। महाराष्ट्र, कश्मीर, पूर्वोत्तर राज्य या जिन भी राज्यों में विघटन की जो वीभत्स घटनाएं हो रही हैं, देशभक्त की हीनता के कारण ही तो हो रही हैं। जिस देश में राष्ट्रीयता का कोई स्थान न हो, जहां संविधान हर दिन कुचला जाता हो, जहां देश को एकसूत्र में बांधे रखने वाला धागा क्षत-विक्षत किया जाता हो, उस भारत देश की विडंबनाओं के बारे में यदि आप सोच नहीं पा रहे तो धिक्कार है...
अभी देश का 60वां गणतंत्र दिवस मनाया गया, लेकिन कश्मीर के लाल चौक पर राष्ट्रीय ध्वज नहीं फहराया जा सका। देश की राजनीतिक पार्टियां, सामाजिक-बौद्धिक संस्थाएं, मीडिया प्रतिष्ठान और पूरा देश सब इस मसले पर गैरजिम्मेदाराना चुप्पी साधे बैठे हैं। आप सब जानते हैं कि पिछले बीस वर्षों से कश्मीर के लाल चौक पर गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया जाता रहा है। लेकिन इस बार लाल चौक पर तिरंगा नहीं दिखा... हां कश्मीर के कई स्थानों पर पाकिस्तानी झंडे लहराते जरूर दिखे। इसके पीछे का कुरूप सच यह है कि खुद जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने श्रीनगर के लाल चौक पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने से मना कर दिया। गणतंत्र भारत के एक राज्य के मुख्यमंत्री और संवैधानिक प्रतिनिधि ने तिरंगा झंडा फहराने पर रोक लगा दी। गणतंत्र दिवस पर सख्त सुरक्षा कवच से घिरा लाल चौक बिना तिरंगे के यह चीख-चीख कर बताता रहा कि भारतीय लोकतंत्र दरअसल किन तत्वों के चंगुल में फंसा है।
राज्य के मुख्यमंत्री ने कहा कि लाल चौक पर झंडारोहण को लेकर होने वाले अनावश्यक विवाद से बचने के लिए इसे रोका जा रहा है। ...और बीस वर्षों से राष्ट्रीय ध्वज के सम्मान का जो कार्यक्रम लाल चौक पर हो रहा था उसे बाधित कर दिया गया। क्या कश्मीर भारतवर्ष का हिस्सा नहीं है? क्या उमर अब्दुल्ला भारतीय नहीं है? फिर देश ने उसे मुख्यमंत्री क्यों बनने दिया? केंद्र ने इस असंवैधानिक कृत्य की आपराधिक उपेक्षा क्यों की? राजनीति के कंधे पर सवार होकर राष्ट्रविरोधी तत्व कहीं पूरे देश को ग्रसते तो नहीं जा रहे? अगर भारतभूमि पर राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान रोक दिया जाए तो यह गंभीर सवाल सामने उठेंगे ही और यह भी कि देशवासी इसे कैसे बर्दाश्त कर रहे हैं! लाल चौक की घटना केवल देश के सुरक्षा बलों के लिए ही नहीं बल्कि जम्मू कश्मीर के लोगों और सम्पूर्ण देश के नागरिकों के लिए घनघोर अपमान की घटना है। उमर अब्दुल्ला ने जो अपराध किया है उसके खिलाफ राष्ट्र और संविधान के अपमान का गंभीर मामला चलना चाहिए और कैद या देश निकाला दिया जाना चाहिए। राष्ट्र सम्मान अपमान निषेध कानून-1971 और भारत का ध्वज कोड-2002 जैसे कानून क्या केवल दिखावा हैं? लेकिन कौन उठाए यह आवाज..? ऐसे संवेदनशील मसले पर भी पूरा देश क्यों साधे है मौन..? केवल एक राजनीतिक दल भाजपा ने जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री के अराष्ट्रीयकृत्य के खिलाफ मीडिया को प्रेस विज्ञप्ति जारी कर छुट्टी पा ली। भाजपा ने यह जरूर कहा कि झंडारोहण रोकने की कार्रवाई से यह जगजाहिर हुआ कि जम्मू कश्मीर सरकार ने आतंकवादियों के आगे घुटने टेक दिए हैं। लेकिन इसके खिलाफ उग्र राष्ट्रव्यापी आंदोलन शुरू करने या प्रतिरोध दर्ज कराने की भाजपा ने कोई आवश्यकता नहीं समझी। क्या इससे बचा रह पाएगा अपने देश का सम्मान? क्या देश का फैशन है ठाकरेयों को गाली देना और अब्दुल्लाओं के खिलाफ नपुंसक चुप्पी साधे रखना, जो धारा 370 जैसे विशेषाधिकार का उपभोग भी करें और संविधान पर सरेआम थूकें भी..?
राष्ट्रीय ध्वज का चयन करने के लिए 23 जून 1947 को डॉ. राजेंद्र प्रसाद की अध्यक्षता में बाकायदा राष्ट्रीय ध्वज समिति का गठन किया था जिसमें मौलाना अबुल कलाम आजाद, केएम पनिक्कर, सरोजिनी नायडू, सी राजगोपालाचारी, केएम मुंशी और डॉ. बीआर अंबेडकर जैसी हस्तियां शामिल थीं। 14 जुलाई 1947 को समिति ने राष्ट्रीय ध्वज के बारे में फैसला लिया जिसे देश के सारे राजनीतिक दलों और नागरिकों ने सर्वसम्मति से स्वीकार किया। इसके बाद ही इसे संविधान में शामिल किया गया और तिरंगा भारतवर्ष के सम्मान और गौरव के साथ जुड़ गया। फिर तिरंगे को लेकर ‘अनावश्यक विवाद’ का सवाल कहां? उमर अब्दुल्ला के पिता और दादा ने उसे जो शिक्षा दी क्या वही पूरे देश के सामने जगजाहिर हो रही है? क्या यह एक गद्दार की अभिव्यक्ति नहीं थी? यदि एक मुख्यमंत्री राष्ट्र ध्वज की महत्ता और उस गौरवबोध से जुड़े सम्पूर्ण देश के नागरिकों की भावनाएं नहीं समझता... तो ऐसे राजनीतिकों की जरूरत ही क्या है? हम क्यों सहन करते हैं ऐसे लोगों को? यह अत्यंत दुखद है... आजादी के पहले और अब तक देश के लिए लगातार दी जा रही कुर्बानियों का इस तरह का सम्मान? अब्दुल्लाओं और ठाकरेयों जैसे नेताओं की भारी तादाद राष्ट्र-भावना पर बदनुमा जख्म की तरह चस्पा है। देश की शिक्षण व्यवस्था नेताओं की साजिश है, जो नस्लों को देशभक्ति और राष्ट्रप्रेम छोड़ कर आधुनिकता, विकास और प्रगतिशीलता सिखाने के बहाने मतिशून्यता के बियाबान में धकेल दे। हम धीरे-धीरे राष्ट्र की महत्ता और उसके लिए दी गई बहुमूल्य कुर्बानियां भूल जाएं। हमें केवल अपने-अपने स्वार्थ याद रह जाएं और उसके लिए हम नेताओं की तरह देश को बेच खाएं... राष्ट्र विरोधी नेताओं के अपराध पर हमारी चुप्पी पाप है। 54 फीसदी भारतीय 25 साल से कम उम्र का है। भारतवर्ष संसार का सबसे युवा राष्ट्र है। युवा राष्ट्र... फिर भी मौन... वाकई आश्चर्यजनक...
(Published in By-Line National News Weekly (Hindi and English) February 13, 2010 Issue under regular column - अंत-अनंत)
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