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साजिश या संयोग लिब्रहान आयोग

» सत्रह साल तक चलने वाले इस आयोग का सच से कोई रिश्ता है या यह महज एक सरकारी षडयंत्र था? सच की इस कब्र को जितना ही खोदिए, सड़े हुए ‘साक्ष्य-शवों’ की उतनी ही बदबू बाहर आती है...

» लिब्राहन आयोग की आधी-अधूरी रिपोर्ट पर कई सवाल उठ खड़े हुए हैं, जिनका जवाब लिब्राहन आयोग के अध्यक्ष एमएस लिब्राहन, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, केंद्रीय गृह मंत्री पलनियप्पन चिदंबरम और उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती को देना ही होगा। देश के सबसे बड़े विवाद की लचर जांच सुविचारित शिथिलता का नतीजा है या सुनियोजित षडयंत्र का, इसका खुलासा तो होना ही चाहिए

» 2009 में मायावती की सरकार यह बता रही है कि सुभाषभान साध की हादसे में मृत्यु के साथ ही 23 फाइलें गुम हो गईं, जबकि वर्ष 2000 की भाजपा सरकार दिल्ली हाईकोर्ट में यह हलफनामा दाखिल कर चुकी है कि सुभाषभान अपने साथ कोई फाइल लेकर दिल्ली नहीं आए थे

» लिब्राहन कमीशन जिस दिन अपनी रिपोर्ट दाखिल करता है उसके छह दिन बाद सात जुलाई 2009 को उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव इलाहाबाद हाईकोर्ट में गृह विभाग के अधिकारी की मौत और 23 महत्वपूर्ण फाइलों के लापता होने की स्वीकारोक्ति करते हैं। जबकि अधिकारी की मौत नौ साल पहले दो मई 2000 को ही हो गई थी

» सीबीआई ने बाबरी मस्जिद राम जन्म भूमि विवाद से सम्बन्धित फाइलों के गायब होने के मामले में उत्तर प्रदेश के 51 अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराया है। उन अधिकारियों की सूची इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के सुपुर्द कर दी गई है

» लिब्राहन आयोग को मात्र तीन महीने के अंदर रिपोर्ट दाखिल करने का समय दिया गया था, लेकिन तीन महीने की बात छोड़िए, आयोग ने पूरे 17 साल तीन महीने लगा दिए। आयोग को 48 बार अवधि-विस्तार का रिकार्ड बनाने का अवसर प्राप्त हुआ

गढ़े गए साक्ष्य, मढ़े गए आरोप, गायब फाइलें, रहस्यमय हत्या, साक्ष्य मिटाने की कुटिल कवायद यह सभी संयोग है या षड्‌यंत्र? राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद की क्| साल तक जांच करने वाले लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट अधूरी है। लिब्राहन आयोग ने विवाद से जुड़े साक्ष्यों की अनदेखी की और आपाधापी में केंद्र सरकार के समक्ष रिपोर्ट दाखिल कर दी। लिब्राहन आयोग की आधी-अधूरी रिपोर्ट से कई कानूनी सवाल खड़े हो गए हैं, जिनका जवाब लिब्राहन आयोग के अध्यक्ष एमएस लिब्राहन, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, केंद्रीय गृह मंत्री पलनियप्पन चिदंबरम और उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती को देना ही होगा। देश के सबसे बड़े विवाद की लचर जांच सुविचारित शिथिलता का नतीजा है या सुनियोजित षडयंत्र का, इसका खुलासा तो होना ही चाहिए। लिब्राहन आयोग की अधूरी रिपोर्ट से उठ रहे सवालों के जवाब ही यह उजागर करेंगे कि यह साक्ष्यों के नष्ट करने का मामला है या साक्ष्यों की जानबूझ कर उपेक्षा करने का या न्याय की प्रक्रिया में बाधा डालने का।

बाबरी मस्जिद-राम जन्म भूमि विवाद से जुड़ी 23 अत्यंत महत्वपूर्ण फाइलें जब लापता थीं तो लिब्राहन आयोग ने अपनी रिपोर्ट दाखिल कैसे कर दी? जब मूल विवाद से सम्बद्ध दो दर्जन महत्वपूर्ण फाइलें गायब थीं तो लिब्राहन आयोग ने आखिर जांच क्या की? प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के समक्ष रिपोर्ट पेश करते समय लिब्राहन आयोग के अध्यक्ष जस्टिस एमएस लिब्राहन ने यह आधिकारिक स्वीकारोक्ति क्यों नहीं की कि आयोग की जांच अधूरी है? लिब्राहन आयोग ने अपनी रिपोर्ट में अयोध्या मसले से सम्बन्धित 23 संवेदनशील फाइलों के लापता होने और उत्तर प्रदेश गृह विभाग के विशेष कार्य अधिकारी सुभाषभान साध की रहस्यमय मौत का उल्लेख क्यों नहीं किया, जिस मौत को सुनियोजित हत्या का मामला बताया जा रहा है? रिपोर्ट दाखिल करने की इस आपाधापी की वजह क्या थी? उत्तर प्रदेश सरकार ने 2009 तक इस मामले में संदेहास्पद चुप्पी क्यों साधे रखी और केंद्रीय गृह मंत्री पलनियप्पन चिदंबरम ने सारी जानकारियों के बावजूद लिब्राहन कमीशन की रिपोर्ट संसद के पटल पर कैसे रख दी? अधूरी रिपोर्ट दाखिल करने और रिपोर्ट में महत्वपूर्ण तथ्यों का उल्लेख नहीं करने वाले लिब्राहन आयोग के खिलाफ ‘डिस्ट्रक्शन ऑफ एविडेंस’ के साथ-साथ ‘ऑब्सट्रक्शन ऑफ जस्टिस एक्ट’ का मामला क्यों नहीं बनता? फाइलों के गायब रहने के बावजूद रिपोर्ट पेश करने की आपाधापी में कमीशन ने कहीं मनमाने साक्ष्य तो नहीं गढ़ लिए? ये गंभीर सवाल सामने हैं। अधूरी रिपोर्ट दाखिल करने से सत्रह वर्षों से लिब्राहन कमीशन को लगातार मिले 48 एक्सटेंशन और उस पर आए करोड़ों रुपए के खर्च पर भी गंभीर प्रश्न चिन्ह लग गया है।

एक मई 2000 को दिल्ली के तिलक ब्रिज रेलवे स्टेशन से गुजर रही काशी विश्वनाथ एक्सप्रेस ट्रेन से सुभाषभान साध को धक्का दे दिया गया था। प्लेटफार्म और ट्रेन के बीच घिसट कर बुरी तरह जख्मी हुए श्री साध को दिल्ली पुलिस ने राम मनोहर लोहिया अस्पताल पहुंचाया, जहां दो मई 2000 को उनकी मौत हो गई। उसके बाद इस मसले पर उत्तर प्रदेश सरकार ने संदेहास्पद चुप्पी साध ली। उस समय केंद्र में भी भाजपा की सरकार थी और उत्तर प्रदेश में भी। केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे और उत्तर प्रदेश में रामप्रकाश गुप्त मुख्यमंत्री। नौ साल तीन महीने तक चुप्पी साधे रखने के बाद जुलाई 2009 में उत्तर प्रदेश सरकार ने इलाहाबाद हाईकोर्ट को यह जानकारी दी कि बाबरी मस्जिद-राम जन्म भूमि विवाद से सम्बन्धित 23 जरूरी फाइलें लापता हैं। दिलचस्प संकेत यह है कि 2009 में मुख्यमंत्री मायावती की सरकार यह बता रही है कि गृह विभाग के अफसर ऑन स्पेशल ड्यूटी (ओएसडी) सुभाषभान साध की हादसे में मृत्यु के साथ ही 23 फाइलें गुम हो गईं, जबकि वर्ष 2000 की भाजपा सरकार दिल्ली हाईकोर्ट में यह हलफनामा दाखिल कर चुकी है कि सुभाषभान अपने साथ कोई फाइल लेकर दिल्ली नहीं आए थे। इन विरोधाभासी आधिकारिक तथ्यों में सच और साजिश का फर्क करना मुश्किल हो गया है। आपको यह भी बता दें कि एक तरफ गृह विभाग के अधिकारी की संदेहास्पद मौत पर उत्तर प्रदेश सरकार ने मौन साधे रखा तो दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश के तत्कालीन प्रमुख गृह सचिव वीके मित्तल दिल्ली आए और लोहिया अस्पताल जाकर फाइलों के बारे में तस्दीक कर चले गए। सरकारी सिक्के के इन दोनों पहलुओं को अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए।

आपको याद ही होगा कि बाबरी मस्जिद ध्वंस के दस दिनों के अंदर 16 दिसम्बर 1992 को लिब्राहन आयोग का गठन कर दिया गया था। आयोग को मात्र तीन महीने के अंदर रिपोर्ट दाखिल करने का समय दिया गया था, लेकिन तीन महीने की बात छोड़िए, आयोग ने पूरे 17 साल तीन महीने लगा दिए। आयोग को 48 बार अवधि-विस्तार का रिकार्ड बनाने का अवसर प्राप्त हुआ। आखिरकार 30 जून 2009 को कमीशन ने रिपोर्ट दाखिल कर दी। अगर दबाव और जल्दीबाजी की विवशता नहीं होती तो कमीशन को और भी एक्सटेंशन मिलता। बाबरी मस्जिद और राम जन्म भूमि विवाद से जुड़ी 23 फाइलों के रहस्यमय तरीके से गायब होने के मामले में चल रही सीबीआई जांच अपने निर्णायक नतीजे पर पहुंचे उसके पहले ही कमीशन ने अपनी जांच पूरी कर ली और आनन-फानन रिपोर्ट दाखिल कर दी। 23 संवेदनशील फाइलों के लापता होने के मामले का लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट में जिक्र करने की भी जरूरत नहीं समझी गई। नवम्बर 2009 में केंद्रीय गृह मंत्री ने लिब्राहन कमीशन की रिपोर्ट संसद के पटल पर भी रख दी। जबकि गृह मंत्रालय को उत्तर प्रदेश गृह विभाग के ओएसडी की संदेहास्पद हत्या और अयोध्या विवाद से जुड़ी 23 फाइलों के रहस्यमय तरीके से गायब होने की पूरी जानकारी थी। जिस मामले की जांच के लिए लिब्राहन आयोग का गठन किया गया था उसी की जांच-रिपोर्ट फाइलों को जांचे बगैर दाखिल कर दी गई। इसमें भी आयोग को 17 साल तीन महीने लग गए। आप इसे साजिश समझें या संयोग... 30 जून 2009 को लिब्राहन आयोग अपनी रिपोर्ट दाखिल करता है और छह दिन बाद सात जुलाई 2009 को उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव अतुल कुमार गुप्ता की ओर से इलाहाबाद हाईकोर्ट को यह इत्तिला की जाती है कि अयोध्या विवाद से जुड़ी 23 महत्वपूर्ण फाइलें गृह विभाग से लापता हैं। अदालत को दी गई इस जानकारी में उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव ने गृह सचिव जावेद अहमद की उस आधिकारिक चिट्‌ठी का हवाला दिया जिसमें यह स्वीकार किया गया है कि अयोध्या विवाद से जुड़ी 23 फाइलें लापता हैं। उस पत्र में यह बताया गया था कि गृह विभाग के ओएसडी सुभाषभान साध उन फाइलों को लेकर गए थे, जिनकी संदेहास्पद मौत तकरीबन दस साल पहले वर्ष 2000 में हो गई थी। उत्तर प्रदेश सरकार ने इस मामले को दस साल तक क्यों दबाए रखा और पिछले 17 साल से मामले की जांच कर रहे लिब्राहन कमीशन ने यह मुद्‌दा क्यों नहीं उठाया? उस पर चुप्पी क्यों सधी रही? यह सब गंभीर संदेह के घेरे में है। लिब्राहन आयोग के वकील रहे पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता अनुपम गुप्ता तो कहते भी हैं कि लिब्राहन आयोग और उत्तर प्रदेश सरकार दोनों पर साक्ष्यों को नष्ट करने (डिस्ट्रक्शन ऑफ एविडेंस) और न्याय की प्रक्रिया में बाधा डालने (ऑब्सट्रक्शन ऑफ जस्टिस एक्ट) का मामला बनता है।

उत्तर प्रदेश के गृह विभाग के अधिकारी की हत्या और फाइलों की गुमशुदगी से लेकर लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट दाखिल होने तक की प्रक्रिया में उत्तर प्रदेश सरकार का झूठ और लिब्राहन आयोग की अनदेखी भयंकर साजिश के संकेत दे रही है। जख्मी हालत के बावजूद गृह विभाग के अधिकारी ने अस्पताल में कहा था कि वे अयोध्या विवाद से जुड़ी दो फाइलें लिब्राहन कमीशन के सुपुर्द करने आए थे। सुप्रीम कोर्ट के वकील रणधीर जैन इसकी बाकायदा पुष्टि करते हैं। श्री जैन कहते हैं कि साध ने घर के लोगों के सामने कहा था कि वे दो फाइलें लेकर आए थे। लेकिन दिल्ली पुलिस ने मृत्यु पूर्व उनका बयान दर्ज करने की कोई जरूरत नहीं समझी।

सुप्रीम कोर्ट के वकील रणधीर जैन बेबाकी से इस घटनाक्रम को उच्चस्तरीय राजनीतिक साजिश का परिणाम बताते हैं। साजिशों की तरफ श्री जैन की उंगली और सामने आए तथ्य देखें... लिब्राहन कमीशन जिस दिन अपनी रिपोर्ट दाखिल करता है उसके छह दिन बाद सात जुलाई 2009 को उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव इलाहाबाद हाईकोर्ट में गृह विभाग के अधिकारी की मौत और 23 महत्वपूर्ण फाइलों के लापता होने की स्वीकारोक्ति करते हैं। जबकि अधिकारी साध की मौत नौ साल पहले दो मई 2000 को ही हो गई थी। फाइलें तब से गायब थीं तो उसी समय क्यों नहीं प्राथमिकी दर्ज कराई गई, अब जाकर उसे क्यों स्वीकार किया गया? या गृह विभाग के अधिकारी की हत्या कराने के बाद फाइलें गायब कराई गईं और उसे सुभाषभान साध के साथ जोड़ दिया गया? छह जुलाई 2000 को उत्तर प्रदेश सरकार के गृह विभाग के तत्कालीन विशेष सचिव केबी अग्रवाल ने दिल्ली पुलिस को दी गई रिपोर्ट में कहा था कि सुभाषभान साध अपने साथ कोई फाइल नहीं ले गए थे। वर्ष 2009 में सरकारी बयान बदल गया। मौजूदा मुख्य सचिव ने कहा कि सुभाषभान साध ओरिजिनल फाइलें लेकर गए थे। दिल्ली पुलिस के तत्कालीन उपायुक्त टीएन मोहन ने वर्ष 2000 में दिल्ली हाईकोर्ट में दाखिल अपने हलफनामे में यूपी के तत्कालीन विशेष गृह सचिव केबी अग्रवाल की रिपोर्ट का जिक्र भी किया था। उस हलफनामे में यह भी कहा गया था कि दुर्घटना के बाद पुलिस की तलाशी में कोई फाइल नहीं मिली न ओरिजिनल और न उसकी फोटो कॉपी। लेकिन मौजूदा मुख्य सचिव 23 फाइलों की गुमशुदगी को सुभाषभान साध की मौत के साथ जोड़ रहे हैं। एक तरफ मृतक आश्रित के नाम पर सुभाषभान साध के बेटे हरीशभान साध को सरकार ने नौकरी भी दे दी और दूसरी तरफ 23 महत्वपूर्ण फाइलें साथ ले जाने का आरोप भी मरहूम सुभाषभान साध पर मढ़ दिया। सरकार ने सुभाषभान की आरोपित हत्या की जांच कराने की जरूरत भी नहीं समझी।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सीबीआई को अयोध्या विवाद से सम्बन्धित 23 लापता फाइलें तलाशने का आदेश दिया। सुभाषभान साध के वयोवृद्ध पिता वीरभान साध अपने बेटे की हत्या की सीबीआई से जांच कराने की मांग करते-करते खुद स्वर्ग सिधार गए। वे लगातार कहते रहे कि उनके बेटे की नियोजित तरीके से हत्या की गई और इसी बहाने अयोध्या विवाद से जुड़ी फाइलें बाद में गायब करा दी गईं। लेकिन वृद्ध की एक नहीं सुनी गई। सुप्रीम कोर्ट के वकील रणधीर जैन साफ-साफ कहते हैं, ‘सुभाषभान साध की मौत के बाद फाइलें गायब की गईं। क्लियर गेम था। यहां तक कि सुभाषभान की हत्या कर उनकी लाश को लावारिस बता कर गायब कर देने की साजिश थी। हत्या का मामला उठाने पर दिल्ली हाईकोर्ट के दो जजों की बेंच को ‘खरीद’ लिया गया। मामला दूसरी बेंच में गया तो उसे भी ‘खरीद’ लिया गया। फिर मामला तीसरी बेंच में गया। यहां कोर्ट ने जब बखिया उधेड़नी शुरू की तो उसे बदल कर चौथी बेंच में लगा दिया गया। चौथी बेंच को भी ‘खरीद’ लिया गया और केस को खत्म कर दिया गया। सारा एविडेंस ही खत्म कर दिया। साजिश करने वाले लोग इतने सक्षम हैं कि वे किसी को भी मरवा दें दिनदहाड़े। सीबीआई वाले भी सुभाषभान के बूढ़े पिता को परेशान कर रहे थे। मैंने बीच में हस्तक्षेप किया। सबने मिल कर मर्डर केस की लीपापोती कर रख दी। उत्तर प्रदेश सरकार ने पहले कहा कि सुभाष लिब्राहन आयोग में फाइलें लेकर गए थे। बाद में स्पेशल सेक्रेटरी होम का हलफनामा दे दिया कि कोई फाइल लेकर नहीं गए थे। यूपी सरकार मर्डर को हशअप करना चाह रही थी। 23 फाइलों के बारे में वे तो अब कह रहे हैं। उस समय तक तो दो ही फाइलों का मुद्‌दा था।’ सुभाषभान साध की विधवा श्रीमती कामता साध की यही साध रह गई है कि उनके पति की हत्या के रहस्य से पर्दा तो हटे।

लापता फाइलों की जांच का जिम्मा सीबीआई को 15 जुलाई 2009 को दिया गया था। हाईकोर्ट ने दो महीने में जांच का काम पूरा कर 24 अगस्त तक रिपोर्ट फाइल करने का निर्देश दिया था, लेकिन सात महीने बीत गए। अब जाकर सीबीआई ने अपनी जांच रिपोर्ट कोर्ट में दाखिल की है। लेकिन इसके पहले ही लिब्राहन कमीशन ने अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार को पेश कर दी। फाइलें गुम होने और गृह विभाग के अधिकारी की रहस्यमय मौत का मामला जांच के अधीन था और अदालत सीबीआई को एक निश्चित अवधि के भीतर रिपोर्ट पेश करने की ताकीद कर चुकी थी फिर भी लिब्राहन कमीशन ने प्रतीक्षा नहीं की। सीबीआई ने बाबरी मस्जिद राम जन्म भूमि विवाद से सम्बन्धित फाइलों के गायब होने के मामले में उत्तर प्रदेश के 51 अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराया है। उन अधिकारियों की सूची इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के सुपुर्द कर दी गई है। जस्टिस डीवी शर्मा, एसआर आलम और सुधीर अग्रवाल की स्पेशल बेंच के समक्ष प्रदेश के महाधिवक्ता ज्योतींद्र मिश्र ने कहा कि सीबीआई की रिपोर्ट के परिप्रेक्ष्य में सम्बद्ध अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी कर दी गई है। फाइलों के लापता होने के मामले की जांच रिपोर्ट के बारे में मुंह खोलने से सीबीआई के अधिकारी कतरा रहे हैं। उनका कहना है कि तीन कॉपियों में जांच रिपोर्ट सील बंद कर अदालत के समक्ष प्रस्तुत कर दी गई जिस पर अदालत ने फिलहाल अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है।

लाल दास और सुभाषभान के साथ ही दफन हो गया सच!

» बाबरी विध्वंस की साजिशों को जानने वाले महंत लाल दास सीबीआई के महत्वपूर्ण गवाह भी थे और ‘सिटिजंस ट्राइब्यूनल’ में अपना विद्रोही बयान देकर चर्चा में भी आ चुके थे। राम मंदिर के पुजारी के रूप में उनकी नियुक्त हाईकोर्ट के आदेश पर हुई थी। लेकिन भाजपा के सत्ता में आते ही उन्हें पुजारी के पद से बर्खास्त कर दिया गया

उत्तर प्रदेश के गृह विभाग के अधिकारी का मारा जाना, अयोध्या मसले से जुड़ी फाइलों का गुम होना और लिब्राहन आयोग की आधी अधूरी रिपोर्ट का दाखिल होना जिस तरह जुड़ा दिखता है उसी तरह अयोध्या राम मंदिर के पुजारी महंत लाल दास की 1993 में हुई हत्या के तार भी इस पूरे प्रकरण में अंतरनिहित दिखते हैं। महंत लाल दास बाबरी मस्जिद विध्वंस के चश्मदीद गवाह भी थे।

याद करें, बाबरी विध्वंस की घटना के एक साल बीतने में 20 दिन बाकी ही थे कि अयोध्या राम मंदिर के पुजारी महंत लाल दास की 16 नवम्बर 1993 की रात को हत्या कर दी गई थी। महंत लाल दास सीबीआई के महत्वपूर्ण गवाह थे। स्वतंत्र विचार और विश्व हिंदू परिषद की धारा का विरोध करने वाले लाल दास को 1981 में ही विवादित परिसर स्थित राम मंदिर का आधिकारिक पुजारी नियुक्त किया गया था। वे विहिप के लोलुप इरादों के खिलाफ आवाज भी उठाते रहते थे। मंदिर पर आने वाले भारी चढ़ावे को खा जाने के खिलाफ भी लाल दास ने ही मुंह खोला था। बाबरी विध्वंस की साजिशों को जानने वाले महंत लाल दास सीबीआई के महत्वपूर्ण गवाह भी थे और ‘सिटिजंस ट्राइब्यूनल’ में अपना विद्रोही बयान देकर चर्चा में भी आ चुके थे। राम मंदिर के पुजारी के रूप में उनकी नियुक्ति हाईकोर्ट के आदेश पर हुई थी। लेकिन भाजपा के सत्ता में आते ही उन्हें पुजारी के पद से बर्खास्त कर दिया गया। गैरकानूनी बर्खास्तगी के खिलाफ महंत लाल दास ने भाजपा सरकार के खिलाफ मामला भी दर्ज कर रखा था। महंत की हत्या के पहले सरकार ने उनके पुलिस अंगरक्षक वापस ले लिए थे। महंत लाल दास ने लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा का मुखर विरोध किया था और इसे स्थगित करने की सलाह दी थी। महंत लाल दास मानते थे कि अगर राजनीति इस मामले में नाक नहीं घुसेड़े तो हिंदू मुसलमान मिल कर इस मामले को खुद ब खुद सुलझा लेंगे। हिंदू और मुसलमान दोनों समुदाय के लोगों ने महंत लाल दास की सकारात्मक पहल की सराहना की थी और देश भर से उनके लिए समर्थन जुट रहा था। राम मंदिर के पुजारी महंत लाल दास को गोली मार कर, गृह विभाग के अधिकारी सुभाषभान साध को ट्रेन से धक्का कर और सख्त सुरक्षा बंदोबस्त के बीच से महत्वपूर्ण फाइलें गायब कर किसे क्या मिला, यह आसानी से समझा जा सकता है। लेकिन यह मुद्‌दा लिब्राहन आयोग या सीबीआई की जांच का विषय नहीं बनता।

‘गुम फाइलों को कभी गंभीरता से नहीं लिया गया’

» हम लोगों के पास आयोग में जो भी दस्तावेज दिए गए थे वे सारे फोटोकॉपी थे। बाकी और डॉक्यूमेंट क्या हैं और क्या गायब हो गए, इसके बारे में हमें पता ही नहीं चला। कमीशन के अंदर कोई सपोर्ट सिस्टम भी नहीं था
- अनुपम गुप्ता, लिब्राहन आयोग के पूर्व वकील


पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता अनुपम गुप्ता लिब्राहन आयोग के वकील रहे हैं। लिब्राहन आयोग के अध्यक्ष एमएस लिब्राहन और अनुपम गुप्ता के बीच कई मसलों पर गहरे मतभेद उभरे और मतभेदों के कारण ही आयोग के काउंसिल अनुपम गुप्ता को 2007 में कमीशन छोड़ना पड़ा। श्री गुप्ता को 1999 में लिब्राहन आयोग का वकील नियुक्त किया गया था। उनके आयोग छोड़ने के बाद 2008 में हरप्रीत सिंह ज्ञानी को कमीशन का काउंसिल नियुक्त किया गया। अयोध्या विवाद से सम्बन्धित 23 फाइलों की रहस्यमय गुमशुदगी से लेकर उत्तर प्रदेश के गृह विभाग के अधिकारी की संदेहास्पद मौत और लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट में इन तथ्यों का उल्लेख नहीं किए जाने को लेकर खड़े हो रहे कानूनी सवालों पर अनुपम गुप्ता से इस संवाददाता की विस्तार से बातचीत हुई। उसके प्रमुख अंश प्रस्तुत हैं:

अयोध्या विवाद से जुड़ी 23 फाइलें गायब थीं, इसकी सीबीआई जांच चल रही थी, फिर लिब्राहन कमीशन ने रिपोर्ट फाइल करने में जल्दीबाजी तो नहीं कर दी? जब उसी केस से सम्बन्धित 23 जरूरी फाइलें लापता हों तो सीबीआई के रिपोर्ट दाखिल करने तक लिब्राहन कमीशन ने प्रतीक्षा करने की जरूरत क्यों नहीं समझी?

देखिए हमारे समय में तो यह मसला नहीं उठा था एक्चुअली। लेकिन एक बार मुझे याद है कि जब मामला आयोग में बहस (आरग्युमेंट) की स्टेज में था तब सुभाषभान की मृत्यु के बारे में एक वकील ने बताया था। लेकिन हमारे सामने यह इश्यु नहीं था।

उत्तर प्रदेश के गृह विभाग के ओएसडी सुभाषभान साध की संदेहास्पद मौत वर्ष 2000 में ही हुई थी। जबकि लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट 2009 में फाइल हुई। इसका मतलब स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने इस मामले को इतने दिनों तक दबाए रखा और कमीशन से भी छुपाए रखा?

हां यह हो सकता है। शायद कल्याण सिंह के काउंसिल ने इसका जिक्र भी किया था। यह भी सामने आया था कि यूपी सरकार के काउंसिल इस मामले में ऐक्टिव रोल प्ले नहीं कर सके थे। लेकिन कमीशन ने भी इस मामले में कोई आदेश जारी नहीं किया और न यह बताया गया कि कौन सी फाइलें गायब हैं, क्या हैं। लिहाजा फाइलें गुम होने का मसला कभी कमीशन के समक्ष मुद्‌दा नहीं बना।

आपके आयोग छोड़ने के बाद वर्ष 2009 में मामला गर्म हुआ... सीबीआई ने फरवरी 2010 में अपनी जांच रिपोर्ट फाइल की। लापता 23 महत्वपूर्ण फाइलें बाबरी मस्जिद-राम जन्म भूमि विवाद से जुड़ी थीं और उसी मामले की समग्रता से जांच करने में लिब्राहन कमीशन ने 17 लंबे साल लगा दिए, फिर अचानक जांच अधूरी छोड़ कर लिब्राहन कमीशन ने रिपोर्ट फाइल करने की जल्दीबाजी क्यों की?

(हंसी)... कमीशन पहले से ही काफी विलंबित (डिलेड) था। अब और कोई देर नहीं करना चाहता था। ...जहां तक मुझे जानकारी है कि उन फाइलों में जवाहर लाल नेहरू, सरदार पटेल व कुछ अन्य महत्वपूर्ण हस्तियों की चिट्ठियां थीं... अयोध्या के तत्कालीन जिलाधिकारी केके नायर की चिट्‌ठी, तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत की चिट्‌ठी व कई अन्य दस्तावेज। हाईकोर्ट ने तो ओरिजिनल फाइलें मांगी हैं। इस मामले में पुरातत्व विभाग के दस्तावेज विशेषज्ञों से पूछताछ की जानी चाहिए। हम लोगों के पास आयोग में जो भी दस्तावेज दिए गए थे वे सारे फोटोकॉपी थे। बाकी और डॉक्यूमेंट क्या हैं और क्या गायब हो गए, इसके बारे में हमें पता ही नहीं चला। कमीशन के अंदर कोई सपोर्ट सिस्टम भी नहीं था। कमीशन की रिपोर्ट में विवाद से जुड़े आइडियोलॉजिकल तथ्यों का जिक्र भी नहीं है। फाइलों और डॉक्यूमेंट्‌स का मसला अत्यंत ही महत्वपूर्ण है और इसे ध्यान में रखा ही जाना चाहिए था।
क्या यह उत्तर प्रदेश सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी नहीं थी कि वह लिब्राहन कमीशन को समय पर आधिकारिक तौर पर सूचित करती कि राम जन्म भूमि बाबरी मस्जिद विवाद से जुड़ी 23 महत्वपूर्ण फाइलें गायब हैं और गृह विभाग के अधिकारी की रहस्यमय तरीके से हत्या हो चुकी है?

यह तो उत्तर प्रदेश सरकार की जिम्मेदारी थी। मुझे याद है कि जब भी कोई भी बात उठती थी तो कोर्ट में लिब्राहन साहब कहा करते थे कि पूरी फाइलें हमें नहीं मिली हैं, नहीं दी गई हैं। उत्तर प्रदेश सरकार के वकील भी जल्दी-जल्दी बदल जाया करते थे। वो भी कहते थे और बीच-बीच में लिब्राहन साहब भी कहा करते थे कि पूरी फाइलें नहीं मिली हैं। लेकिन मुझे कभी नहीं लगा कि लिब्राहन साहब इसे गंभीरता से ले रहे हैं या गंभीरता से कह रहे हैं। क्योंकि कभी स्पेसिफिक उन्होंने इस बारे में कुछ भी नहीं कहा... यह आप सही कह रहे हैं कि डिले अपनी जगह है लेकिन गायब फाइलों का संदर्भ और उसका महत्व अपनी जगह तो है ही।

लिब्राहन कमीशन की रिपोर्ट में गुमशुदा फाइलों के बारे में जिक्र तो होना चाहिए था?

कमीशन की रिपोर्ट में इसका कोई जिक्र नहीं है। मौखिक तौर पर वे इस बारे में कहा करते थे लेकिन रिपोर्ट में इसका कहीं उल्लेख नहीं है।

मूल विवाद से जुड़ी 23 फाइलों के गायब होने के बावजूद कमीशन ने अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार को पेश कर दी। ऐसे में क्या लिब्राहन आयोग और उत्तर प्रदेश सरकार पर झूठे साक्ष्य गढ़ने (मैनुफैक्चरिंग फॉल्स एविडेंस) का मामला नहीं बनता? क्योंकि आपने माना है कि लिब्राहन कमीशन की रिपोर्ट में फाइलों के गायब होने का जिक्र नहीं है...
हां यह तो है कि कमीशन की रिपोर्ट में फाइलों के लापता होने का कोई जिक्र नहीं है। नहीं... दो बातें हैं... डिस्ट्रक्शन ऑफ एविडेंस और ऑब्सट्रक्शन ऑफ जस्टिस ऐक्ट। इसमें इंडियन पेनल कोड की धारा 201 का मामला भी बनता है और 202 का भी। यह तो वैसे ही हुआ जैसे किसी का कत्ल किया और उसकी बॉडी नष्ट कर दी। तो 302 भी बनता है और 201 भी। जो आप कह रहे हैं यदि वह सच है तो यह डिस्ट्रक्शन ऑफ एविडेंस के साथ-साथ ऑब्सट्रक्शन ऑफ जस्टिस ऐक्ट के तहत भी आएगा। मैनुफैक्चरिंग फॉल्स एविडेंस तो तब बनता जब किसी एक तथ्य के बजाय कोई दूसरा तथ्य बना कर पेश कर दिया जाता। ऐसा तथ्य जिसका कोई अस्तित्व ही नहीं होता। इसीलिए मैं नहीं समझता कि यह मसला मैनुफैक्चरिंग फॉल्स एविडेंस का है, यह मसला डिस्ट्रक्शन ऑफ मैटीरियल एविडेंस का हो सकता है।

लापता फाइलों में गुम हो गए तथ्य...

उत्तर प्रदेश के किलाबंद सचिवालय के गृह विभाग से अयोध्या मसले की जो 23 फाइलें गायब कर दी गईं उनमें आखिर कौन से तथ्य थे जिसके लिए इतनी बड़ी साजिश रची गई। कुछ फाइलों के ऊपर टंके सरकारी शीर्षक उन फाइलों की गंभीरता बताने के लिए काफी हैं। इन चार लापता फाइलों से अन्य 19 गुमशुदा फाइलों का महत्व समझा जा सकता है।

» 1951 में उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा दाखिल हलफनामे से सम्बंधित दस्तावेज
» विवादास्पद परिसर मंदिर नहीं मस्जिद
» बाबरी मस्जिद को बम विस्फोट से उड़ाने की साजिश
» कल्याण सिंह सरकार द्वारा 1991 में अयोध्या की जमीन का अधिग्रहण

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वर्ष 2002 में अयोध्या मसले से सम्बंधित सात दस्तावेजों का पता लगा कर उन्हें पेश करने का आदेश दिया था। वर्ष 2009 में लापता फाइलों की संख्या बढ़ कर 23 हो गई। यह संख्या कैसे बढ़ गई इसका रहस्य तो उत्तर प्रदेश सरकार ही जानती है। सरकार ने अदालत को इतना ही कहा कि वे सात दस्तावेज भी उन लापता फाइलों में शामिल हो सकते हैं। बहरहाल, सीबीआई सूत्रों का कहना है कि ज्यादातर फाइलें वर्ष 1949 में केंद्र, उत्तर प्रदेश सरकार और फैजाबाद जिला प्रशासन के बीच हुए पत्र व्यवहार से सम्बद्ध हैं। इनमें मंदिर से मूर्ति हटाने के बारे में 1949 में लिखा गया जवाहरलाल नेहरू का पत्र भी शामिल है। इसके अलावा 1949 में फैजाबाद के जिलाधिकारी केके नायर और राज्य के मुख्य सचिव के बीच हुए पत्र व्यवहार से सम्बद्ध दस्तावेज भी अदालत में पेश करने को कहे गए थे। सीबीआई के एक अधिकारी ने बताया कि लापता 23 फाइलों में से सीबीआई केवल आठ फाइलों के बारे में ही सुराग लगा पाई है।

(This Cover Story of Prabhat Ranjan Deen was Published in By-Line National Weekly News Magazine (Hindi & English) - in February 20, 2010 Issue)


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