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जिंदा नजर आना जरूरी है...

मध्य पूर्व के एक प्रमुख अखबार के पत्रकार साथी ने भारत देश की नैतिक-महानता की बड़बोली गाथाएं सुनते हुए अपनी यह टिप्पणी दी कि जिस देश में खाने के सामान में भारी तादाद में जानलेवा मिलावट होती हो और उसके खिलाफ कोई सख्त कानून न हो, उससे अधिक गिरा हुआ देश और कोई हो ही नहीं सकता। दुबई के उस पत्रकार मित्र का कहना था कि केवल मध्य पूर्व के देश ही नहीं, चीन समेत कई अन्य देशों में भी खाद्य पदार्थों में मिलावट की सजा मौत है। क्योंकि इससे अधिक गंभीर अपराध और कुछ हो ही नहीं सकता।

मिलावटी आहार के साथ मनाए गए नकली त्यौहार पर छद्‌मी शुभकामनाएं देने वाले इस महान देश के वासी वाकई पीठ थपथपाने लायक हैं। दुबई के रहने वाले पत्रकार साथी की बातों का कतई अन्यथा न लें, उन्होंने खाने के सामने में मिलावट की बात कह कर अपने संयमित संस्कार का ही परिचय दिया क्योंकि अब केवल उन्हें ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया को यह पता चल गया है कि भारत के लोग नकली आहार, नकली आचार, नकली विचार, नकली संस्कार और नकली व्यवहार वाले लोग हैं। हम इतने गए बीते हैं कि अपनी ही नस्लों को नकली दूध, नकली खोया, नकली पनीर, नकली मसाले, मिलावटी अनाज व नकली सब्जियां खिला कर केंचुआ बनाने पर तुले हैं और बातें दुनिया जीतने की करते हैं। 1947 से लेकर आज तक नाकारे नेतृत्व की साजिशों के प्रतिफल में हमें जो नकली होने का सामाजिक-राजनीतिक संस्कार मिला उसने हमें इस लायक नहीं छोड़ा कि हम नस्लों को नपुंसक बनाने की कोशिशों के खिलाफ कारगर प्रतिकार दर्ज कर पाएं।

जब हमारी यह स्थिति है तो आने वाली नस्लें कितनी प्रजा-भाव से लबालब और दंडवत होंगी, इसका अंदाजा अगर उतनी भी क्षमता शेष बची हो तो लगा लें। 70 के दशक में कम से कम इतनी ताकत थी जनता में कि वह पुरजोरी से नारा लगा पाती थी... ‘देखो यह इंदिरा का खेल, खा गई राशन पी गई तेल’... जनता का वह आत्मबल लोकनायक जयप्रकाश नारायण के राजनीतिक रूप से असफल किन्तु ऐतिहासिक रूप से सफल आंदोलन के बतौर शिनाख्त दर्ज कराने में कामयाब हुआ। चार दशकों में ही भारतवासियों की रगों में इतनी कृत्रिमता भर दी गई कि बेपनाह महंगाई और बेलगाम मिलावट के खिलाफ एक आवाज नहीं उठती जो सार्थक विरोध की सनद दे! महंगाई के खिलाफ नेताओं और राजनीतिक दलों के विरोध और संसद में शोर-शराबे की बात रहने दें... यह विरोध तो वैसे ही है जैसे भागता हुआ चोर खुद ही चोर-चोर का शोर मचाता हुआ भाग निकलता है।

नेता और राजनीतिक दल भड़ुओं का समूह नहीं होता तो यह स्थिति ही क्यों आती। महंगाई और मिलावट उनके लिए नहीं। उनके घरों में सब शुद्ध भोजन और शुद्ध आबोहवा। नेताओं के घरों में पहुंचने वाला शुद्ध खाद्य पदार्थ उन्हीं व्यापारियों द्वारा पहुंचाया जाता है, जो खाने के सामान में खतरनाक मिलावटें करते हैं। लेकिन वह मिलावट का सामान हमारे आपके लिए है। तभी तो खाने के सामान में मिलावट करने वाले राष्ट्रद्रोही-समाजद्रोही तत्वों के खिलाफ आज तक कोई सख्त कानून नहीं बनाया गया। नस्लों के खिलाफ साजिश करने वाली जमात भारत वर्ष में सबसे स्वस्थ, सुखी और सम्पन्न है। अन्य देशों में ऐसे तत्वों को मिलती है फांसी और हमारे देश में कानून है इनकी रखैल। खाने का कोई भी सामान ऐसा नहीं है कि जो बिना किसी मिलावट का हो। यह सब पूंजी का खेल है। पंचायतों से लेकर नगर पालिकाओं और विधानसभाओं से लेकर संसद तक काबिज छुटभैये नेता से लेकर बड़े नेता तक हमारे आपके प्रतिनिधि थोड़े ही हैं। ये विभिन्न पूंजीवादी सिंडिकेटों के दलाल हैं, जो सत्ता-सदनों में बैठ कर उनका हित साधते हैं।

खाने के सामान में मिलावट से एक पूंजीवादी लॉबी फायदे में रहती है तो उससे स्वास्थ्य में आने वाली गिरावट से मेडिकल-बिजनेस में धन लगाने वाली अन्य पूंजीवादी लॉबी फायदा कमाती है। दवा में मिलावट कर धन बटोरने वाले व्यापारी अपना अलग फायदा उठाते हैं। आप सड़कों पर गाड़ियों की भरमार देखें। यह भी एक पूंजीवादी लॉबी को फायदा पहुंचाने का ही नतीजा है। लोन पर कार और मोटरसाइकिलें खरीदने की सुविधा दरअसल पूंजीपतियों को फायदा पहुंचाने की साजिश के तहत दी गई है। घर के लिए लोन देकर आयकर में छूट भी राजनीतिकों की देशद्रोही साजिश है। शहरों का विस्तार बढ़ा कर अनाज पैदा करने वाले खेतों को हाउसिंग कॉलोनियों के गैरउत्पादक शक्ल में बदल डालने का सोचा-समझा तिकड़म। पानी को सोखने की पूंजीवादी कंपनियों को दी गई सरकारी इजाजत आखिर किसके फायदे के लिए है?

जरा सोचें... लेकिन केवल सोचें ही नहीं, कुछ करें भी। कम से कम आवाज तो उठाएं, सचेत तो हों। ये नेता पूंजीवादी लॉबियों के दलाल हैं, हमारे-आपके बूते। इनके बच्चे अच्छा खाते हैं, अच्छा पढ़ते हैं और अच्छा कमाते हैं, हमारे आपके बूते। ...पर हम उनकी कुंठाग्रस्त प्रजा बने रहना चाहते हैं। कर्ज लेकर खरीदी कार और मोटरसाइकिलों पर सवार होकर हम खुद की मनोवैज्ञानिक कुंठा दूर करते हैं। कर्ज लेकर शहरों में फ्लैट खरीद कर हम खेतों की हत्या में शामिल होते हैं। इसीलिए हमारी धार कुंद हो गई है। इसीलिए विद्रोह का स्वर घिघ्घी के कातर स्वर में बदल गया है। आज लोक नहीं तो नायक नहीं। लोक चरित्रहीन होगा तो नायक गिरे हुए चरित्र का होगा ही। समय हाथ से निकल रहा है। अब भी नहीं टकराए तो आने वाली निरीह नस्लों के हम गुनाहगार होंगे।

...उसूलों पे जहां आंच आए वहां टकराना जरूरी है
जो जिंदा हों तो फिर जिंदा नजर आना जरूरी है...


(Published in By-Line National News Weekly (Hindi and English) March 13, 2010 Issue under regular column – अंत-अनंत)


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