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लकवाग्रस्त लोकतंत्र का लोकमंचन

जनता जल रही है। जनप्रतिनिधि मायावती जनतंत्र के बहाने राज प्रायोजित ‘शक्ति-आतंक’ के प्रदर्शन के आनंदातिरेक में हैं। आपको दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के सबसे बड़े लोकतांत्रिक राज्य में लोकतंत्र की असलियत परखनी हो तो उन मासूम नाबालिग बच्चों के पास जाइए जो अभी-अभी जेल से छूट कर बाहर आए हैं। इन बच्चों ने होली के उत्साह में मायावती के पोस्टर पर रंग उछाल दिया था। यह उनका गंभीर अपराध था और पुलिस इस गंभीर अपराध के प्रति इतनी गंभीर थी कि उसने चार भोले-भाले बच्चों को न केवल गिरफ्तार किया बल्कि उनकी बर्बर पिटाई की और जेल में ठूंस दिया। प्रदेश की जनतांत्रिक मित्र-पुलिस ने बाल अपराध कानून को कूड़ेदान में डाल दिया और बच्चों को बाल सुधार गृह भेजने के बजाय उन्हें पेशेवर बालिग अपराधियों की बड़ी जेल में डालने की हठ तक की हद कर दी। हम आभार जताएं न्यायपालिका का... कि आखिरकार वहां न्याय और लोकतंत्र के औचित्य की हिफाजत हुई और बच्चों को रिमांड होम भेजने का आदेश जारी हुआ। मुख्यमंत्री के पोस्टर पर रंग डालने का ‘संज्ञेय’ अपराध करने वाले चारों मासूम बच्चे सैनिक स्कूल के मेधावी छात्र हैं। उन्होंने राष्ट्रीय रक्षा अकादमी की परीक्षा पास कर रखी थी। मायावती की चाकर पुलिस ने उन मेधावी बच्चों का जीवन नष्ट करने का संज्ञेय अपराध किया। ऐसे बेजा पुलिसवालों की सजा गिरफ्तारी और बर्खास्तगी होती, लेकिन ऐसा ईमानदार और लोकतांत्रिक शासन मौजूदा दौर की बेमानी बातें हैं। प्रदेश में बच्चे तक त्यौहार का उत्साह मनाने और बाल सुलभ अभिव्यक्तियां देने का हक खो चुके हैं। बड़ों की तो बात ही छोड़िए।

बरेली शहर जल रहा है। मायावती राज-प्रायोजित जन-दौड़ (मास रैली) का आनंद ले रही हैं। हिंसाइयों ने बरेली के लोगों को होली नहीं मनाने दिया। बरेली की सड़कें उनके कब्जे में थीं। दुकानें लूटी गईं, जलाई गईं और पेट्रोल पंपों में आग लगा कर उड़ाने की कोशिशें की गईं। होली के समय जो कर्फ्यू लगा वह आज तक जारी है... लेकिन मुख्यमंत्री प्रजातंत्र का प्रहसन दिखाने में व्यस्त थीं। राजनीतिक ताकत के बजाय प्रशासनिक हिमाकत से लखनऊ में आयोजित जन-दौड़ के बारे में जन से संवाद करें तो तनाव में भी आपको हंसी आ जाएगी। सरकार ने जैसी घुड़दौड़ की, जैसी बदहवास भगदड़ लखनऊवासियों ने भोगी.. वह वाकई हास्यास्पद भी है और त्रासद भी। क्या किसी नेता का ऐसा ही लोकतांत्रिक चरित्र होता है? बैंक बंद, कार्यालयों में काम-काज ठप्प, दुकानों पर ताला, शैक्षणिक संस्थाएं लकवाग्रस्त, लोग घरों में नजरबंद... क्या है यह? क्या भाड़े की भीड़ भरोसेमंद हो सकती है? क्या ऐसी सियासत करने वाला भरोसेमंद हो सकता है? क्या इससे लोकतंत्र की लोकलाज रह पाएगी? पूरा शहर गर्द के गुबार से भरा था... सुप्रीमकोर्ट और हाईकोर्ट के आदेशों की मायावती द्वारा उड़ाई गई धज्जियों का गर्द लखनऊ के आसमान पर जैसे छा गया था। धूल से हो रही घुटन लोकतंत्र और संविधान के प्रति मायावती के सम्मान की असलियत है...

अभी हाल तक बागों का शहर था लखनऊ, आज जल रहा है। लोकतांत्रिक आदर्श अपने हाथ मल रहा है। मायावती इतिहास में राजनीतिक के तौर पर नहीं बल्कि स्थापत्यिक के रूप में स्थापित होने की मनोवैज्ञानिक कुंठा से ग्रस्त हैं। उन्हें इसका अहसास नहीं कि वे लोकतंत्र की जमीन खोद कर उसे खोखला करने वाले ‘विशेषज्ञ’ के बतौर स्थापित होती जा रही हैं। आप ऐसे व्यक्ति की प्रकृति के बारे में कल्पना कर सकते हैं जो प्रकृति विरोधी हो, जो हरे भरे वृक्षों की सामूहिक हत्या कराता हो, शहर को पत्थरों से चुनवा देता हो और उड़नखटोले में बैठ कर उत्तप्त पत्थरों के नर्क से उठ रही असह्य तपिश से परेशान आबोहवा और हलकान जनता को देख कर खुद के महारानी होने का मनोवैज्ञानिक सुख लेता हो...

पेट जल रहे हैं। नेता पल रहे हैं। दलितों के नाम पर नेता अकूत धन बटोर रहे हैं। नेताओं की दारिद्रिक पृष्ठभूमि से आप उनकी मौजूदा सम्पन्नता और उसके छलकाव के भौतिक परिवर्तन की तीव्र यात्रा का अंदाजा लगा सकते हैं। हजार रुपए के नोट की विशाल माला अर्पित करने और स्वीकार करने के मनोविज्ञान की तो बात छोड़िए। आप केवल यह सोचिए कि हजार के नोटों की वह विशाल माला किनके बूते बनी होगी? कहां से आए होंगे करोड़ों रुपए मूल्य के उतने ढेर सारे हजार के कड़क नोट? उन नोटों का स्त्रोत क्या है? इसका कोई कानूनी हिसाब-किताब है कि नहीं? या कि आयकर या प्रवर्तन की हेकड़ियां केवल आम आदमी के लिए हैं? यह हम क्यों सोचें... हम तो ‘एनिमल फार्म’ के वाशिंदे हैं। यह समझने में नाकाबिल हैं कि बलि चढ़ने की कल हमारी ही बारी है। ...लेकिन हम हमेशा गड़रियों के कुत्तों से हांके जाने को अभिशप्त नहीं, तैयार हैं। हमने भारतीय लोकतंत्र को मस्तिष्कहीन पशुओं की आढ़त बना डाला है।

खेत-खलिहान जल रहे हैं। पर मायावती अपने ही मनमाने अराजक रवैये पर चल रही हैं। लोकतांत्रिक-प्रशासन के मायने पलट कर रख दिए गए हैं। जन-धन अर्थहीन मनोवैज्ञानिक विकृतियों पर नष्ट किया जा रहा है। नहर सोते सब सूख गए। तालाब-कुएं पाट कर नेताओं ने प्लॉट बना डाले। नदियां बदबूदार नालों में तब्दील हो गईं। नदियों के किनारे का सुकून और उसकी हरीतिमा छीन ली गई। नदियों के पाट धनपशुओं को होटल बनाने के लिए बेच डाले गए। उन होटलों में गंदे नेता, दलाल और नव-औपनिवेशिक प्रतिउत्पाद ऐश करेंगे। ...और देश को बेच खाने की प्लानिंग करेंगे। हम और कितने दिन लकवाग्रस्त लोकतंत्र का लोकमंचन देखते रहेंगे? यह कभी समाप्त भी होगा या नहीं? इसका जवाब जन-अदालत में है। लेकिन यदि देश के नागरिकों का विचार-पथ भ्रमित नहीं होता तो क्या लोकतंत्र इतने बदनुमा शक्ल में कभी दिखता? नागरिक ही जिम्मेदार है, दोषी है। अटल बिहारी वाजपेयी के भाषण का छोटा सा हिस्सा है... ‘भारतीय लोकतंत्र खोखला हो चुका है। इसका बाहरी खोल भले ही ठीक दिखता हो, पर अंदर से दीमकों ने इसे जर्जर कर दिया है। हैरत इस बात पर होती है कि भारतवर्ष में लोकतंत्र का पौधा रोपा भी गया था कि नहीं, या कि सब फर्जी था...’ आप किसी व्यक्ति पर नहीं व्यक्ति के वक्तव्य के सत्‌ पर जाएं... देश और अपने प्रदेश के दलितों को देखें... समाज के सबसे निचले पायताने पर अपना अस्तित्व बचाए रखने की उनकी जद्‌दोजहद जारी है... इससे क्या फर्क पड़ता है कि उ‹होंने किसे वोट देकर महारानी बनाया और किसे नहीं...

(Published in By-Line National News Weekly (Hindi and English) March 27, 2010 Issue under – सम्पादकीय)


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