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| क्रांतिकारी अभिवादन कानू दा! |
कानू सान्याल को क्रांतिकारी अभिवादन। योद्धा जिंदगी और मौत दोनों से समान व्यवहार करता है। कानू दा योद्धा थे। वे योद्धा की तरह जिए और इस भौतिकवादी स्वार्थी दुनिया से रवानगी के लिए उन्होंने योद्धा की तरह ही अपनी मौत का रास्ता खुद चुन लिया। प्रकृति आपको जीने का नैसर्गिक अधिकार देती है और मरने का भी... इस पर किसी भी बहस का मतलब नहीं, क्योंकि घिसट कर जीने का भी कोई मतलब नहीं।
मैंने कोशिश की थी कि कानू दा से सम्पर्क में रह पाऊं। 1990 से 1996 के बीच तो उनसे कोलकाता में लगातार मुलाकात होती रही। कोलकाता उस समय कलकत्ता था और मैं जनसत्ता में वहीं काम कर रहा था। कानू दा हमेशा कहा करते थे कि हिंदी आम लोगों की भाषा है और देश के आम जन को सूचित और शिक्षित करने में भाषाई समाचार पत्रों को बहुत बड़ी भूमिका अदा करनी है। कानू दा में नेतृत्व की अद्भुत क्षमता थी, लेकिन कहीं कोई दंभ नहीं बिल्कुल ही सरल और सपाट। कानू दा की जिंदगी उन तमाम नक्सली लीडरों और वामपंथी नेताओं के लिए सीख है जो खुद तो बुर्जुआ हो गए लेकिन राजनीति की उनकी दुकान सर्वहारा के उत्थान की खोखली तकरीरों पर चल रही है। कानू दा जब कभी कलकत्ता आते अपने खास मित्र अहमद साहब के चौरंगी स्थित फ्लैट पर रुकते। तब मोबाइल फोन हाथ में नहीं हुआ करते थे। अहमद साहब दफ्तर में फोन कर कानू दा के कलकत्ता आने की सूचना देते और चौरंगी रोड स्थित पुराने भवन की तीसरी या चौथी मंजिल का वह फ्लैट हमलोगों की कई मुलाकातों और झाल-मूरी खाते हुए लंबी बातचीत का गवाह बनता।
उस समय भी कानू दा प्रेस वालों से ज्यादा अंतरंग नहीं होना चाहते थे। मुझे हमेशा अकेले आने का आदेश देते, यहां तक कि फोटोग्राफर भी नहीं। मुझे याद है कई अनुरोधों के बाद एक बार उन्होंने फोटोग्राफर के साथ आने की इजाजत दी और फोटोग्राफर अशोक नाथ डे ने कानू दा की कई तस्वीरें उतारी थीं। कई बार मैंने धर्मतला स्ट्रीट पर कानू दा को आम लोगों की भीड़ में पैदल जाते देखा और उनकी निगाह मेरे पर पड़ती तो वे बड़े अंतरंग भाव से हाथ हिलाते। हल्की बारिश में भीगते हुए कानू दा को फुटपाथ की दुकान पर बचते हुए भी देखा। आम आदमी की तरह सीधे-सादे कानू दा। संतों की तरह सरल, लेकिन आम लोगों के हक के लिए हर पल संघर्षरत। उम्होंने मुझे अपने करीब आने की इजाजत भी इसलिए दी थी कि मैं आम आदमी से जुड़ी खबरें छापना चाहता था और उनके विशाल अनुभवों से कुछ प्राप्त करना चाहता था। कानू दा के पास भंडार था एक्सक्लूसिव खबरों का... मानवाधिकार हनन से सम्बन्धित खबरें हों या ग्रामीण उत्पीड़न और अत्याचार की, किसान आंदोलन से जुड़ी खबरें या आंदोलन की योजनाओं से जुड़ी खबरें, पुलिस उत्पीड़न की खबरें हों या वामपंथी कैडरों द्वारा ग्रामीणों पर मचाए जा रहे बर्बर तांडव की खबरें... बस छापते जाएं। कानू दा ऐसी खबरों को व्यापक पटल पर देखना चाहते थे, पर खुद को गौण रखते हुए। उन्होंने खुद को हाईलाइट किए जाने के आकर्षण से लगातार बचाए रखा। नक्सली संगठनों के बीच लगातार हो रही टूट और लगातार बन रहे नए-नए संगठनों से कानू दा बहुत ही क्षुब्ध रहते थे। उनकी तकलीफ ठीक उस पिता की तरह थी जिसके सामने परिवार टूट कर बिखरता होता है और वह कुछ नहीं कर पाता। नक्सलबाड़ी के एक गांव से शुरू हुई कानू दा की संघर्ष यात्रा, जिसने नक्सलबाड़ी को अंतरराष्ट्रीय ख्याति दी... उसी नक्सलबाड़ी ने कानू दा का निष्पंद शरीर फांसी के फंदे से लटकता पाया। कानू सान्याल सीपीएम की दार्जिलिंग इकाई के जिला संयोजक थे, लेकिन किसानों पर 24 मई 1967 को हुई पुलिस फायरिंग में 11 किसानों के मारे जाने के बाद उन्होंने पार्टी छोड़ दी और किसान आंदोलन में सीधे कूद पड़े। चारू मजुमदार और जंगल संथाल की तरह कानू दा भी यह मानते थे कि किसानों का आंदोलन ही भारतीय समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन लाएगा। जो खेतों को जोते-बोए, वही खेत का मालिक होए का विचार आंदोलन कानू दा के नक्सलबाड़ी आंदोलन का ही प्रतिफल है। नक्सलबाड़ी आंदोलन की अभूतपूर्व पहचान से सीपीआई (मार्क्सवादी-लेनिवादी) संगठन अस्तित्व में आया। कानू दा ने 22 अप्रैल 1969 को लेनिन की जयंती पर कलकत्ता की रैली में ही सीपीआई (माले) को अस्तित्व में लाने की घोषणा की थी। क्रांतिकारी संघर्षों का इतिहास इसका गवाह है कि नक्सलबाड़ी आंदोलन के मौलिक प्रणेता कानू सान्याल ही थे। कानू दा ने मोर ऑन तराई मूवमेंट में लिखा भी कि नक्सलबाड़ी आंदोलन खेत जोतने बोने वाले किसानों को खेतों का मालिक बनवाएगा। और यह भी लिखा कि नक्सलबाड़ी आंदोलन राज सत्ता हथियाने का संघर्ष नहीं था, उसे तो चारू मजुमदार ने सत्ता हासिल करने के संघर्ष से जोड़ दिया।
सत्तर के दशक के वे दिन थे जब मीडिया ने कानू सान्याल को महान क्रांतिकारी के बतौर देश के सामने प्रस्तुत किया और उनकी तुलना महात्मा गांधी और जतिन दास से की। इसकी वजह थी कानू दा की करिश्माई नेतृत्व-क्षमता और उनका आकर्षक जन-संबोधन। लेकिन जिस कानू सान्याल को नक्सलबाड़ी के लेनिन के रूप में संसार भर में पहचान मिली, उन्हें पुलिस दमन और बर्बर प्रताड़नाओं से लेकर नक्सलबाड़ी आंदोलन की आरोपित-असफलता की त्रासद पीड़ा तक झेलनी पड़ी। कानू दा को अंडरग्राउंड हो जाना पड़ा। अगस्त 1970 में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। विरोध में व्यापक हिंसा की घटनाएं हुईं और आंदोलन को कुचल डाला गया। कानू दा सात साल तक विशाखापट्टनम जेल में बंद रहे और पार्वतीपुरम नक्सली षडयंत्र केस में उन्हें सजा भी हो गई। 1977 में केंद्र और पश्चिम बंगाल दोनों जगह सत्ता परिवर्तन हुआ। बंगाल के मुख्यमंत्री बने ज्योति बसु ने पहल करके कानू दा को जेल से रिहा कराया। इस बीच कानू सान्याल संघर्ष के हिंसक रास्ते के परित्याग की घोषणा भी कर चुके थे। पूरा नक्सल आंदोलन छिन्न-भिन्न हो गया। संगठन टूट-टूट कर बिखर गया। कानू सान्याल ने पूरा जीवन अतिवामपंथियों को एकजुट करने और किसान आंदोलन को फिर से शक्ल देने में खपा दिया। कानू दा ने कई संगठन भी बनाए, कई बिखरे गुटों को मिलाया। पर नाकाम रहे। 2006 में कानू दा ने सिंगूर के किसान आंदोलन में भी सक्रिय रहे। जीवन के अंतिम समय वे न्यू सीपीआई (एमएल) के महासचिव थे। कानू दा की जिंदगी और उनकी आजीवन संघर्ष-यात्रा कामयाबी या नाकामी के कोणों से नहीं देखी जानी चाहिए... कानू दा लड़ाकू थे... वे लड़ते रहे, जिंदगी और मौत दोनों के साथ...
(Published in By-Line National News Weekly (Hindi and English) under सम्पादकीय)
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